आवाज के जादूगर व सुर-सम्राट मोहम्मद रफी का गुरूवार को 85वां जन्मदिन था। यूं तो 1980 में रफी साहब का देहांत हो चुका हैं। मगर उनकी दिलकश आवाज और मदमस्त गीतों की गूंज आज भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर मौजूद हैं। जाने के बाद वो अपने आंसू नहीं रोक पाती हैं। 24 दिसंबर 1924, यह वो दिन था जब इस सदी का सबसे बडा गायक जन्मा। जब भारतीय संगीत के लिए एक अवतार इस दुनिया में आया। हम बात कर रहे है प्लेबैक सिंगर मोहम्मद रफी साहब की, 1945 में गायिकी की सफर का शुरूआत करने वाले इस फनकार ने जब नौशाद साहब के साथ गाना शुरू किया तो मुगले आजम के जिंदाबाद गाने के साथ ही उनका नाम भी इंडस्ट्री में जिंदाबाद हो गया। अपनी आवाज की मधुरता और परास की अधिकता के लिए इन्होंने अपने समकालीन गायकों के बीच अलग पहचान बनाई।
इन्हें शहंशाह-ए-तरन्नुम भी कहा जाता था। मोहम्मद रफी की आवाज ने अपने आगामी दिनों में कई गायकों को प्रेरित किया। इनमें सोनू निगम, मुहम्मद अजीज और उदित नारायण का नाम उल्लेखनीय हैं- यद्यपि इनमें से कइयों की अब अपनी अलग पहचान हैं। 1940 के दशक से आरंभ कर 1980 तक इन्होंने कुछ 26,000 गाने गाए। इनमें मुख्य धारा हिंदी गानों के अतिरिक्त गजल, भजन, देशभक्ति गीत, कव्वाली तथा अन्य भाषाओं में गाए गीत शामिल हैं। जिन अभिनेताओं पर उनके गाने फिल्माए गए उनमें गुरू दत्त, दिलीप कुमार, देव आनंद, भारत भूषण, जॉनी वॉकर, जॉय मुखर्जी, शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेद्र, जीतेंद्र और ऋçष्ा कपूर के अलावा गायक अभिनेता किशोर कुमार का नाम भी शामिल हैं। आरंभिक जीवन: मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर, के पास कोटला सुल्तान सिंह में हुआ था। आरंभिक बाल्यकाल में ही परिवार लाहौर से अमृतसर आ गया। इनके परिवार का संगीत से कोई खास सरोकार नहीं था। जब रफी छोटे थे तब इनके बडे भाई की नाई दुकान थीं, रफी> का काफी वक्त वहीं पर गुजरता था। कहा जाता है कि रफी जब सात साल के थे तो वे अपने बडे भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे जो उधर से गाते हुए जाया करता था। उसकी आवाज रफी को पसंद आई और रफी उसकी नकल किया करते थे। उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज भी पसंद आने लगी।
लोग नाई की दुकान में उनके गाने की प्रशंसा करने लगे। लेकिन इससे रफी को स्थानीय ख्याति के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला। इनके बडे भाई मोहम्मद हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रूचि को देखा और उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा लेने को कहा। एक बार आकाशवाणी (उस समय ऑल इंडिया रेडियो) लाहौर में उस समय के प्रख्यात गायक-अभिनेता कुंदन लाल सहगल अपना प्रदर्शन करने आए थे। इसको सुनने हेतु रफी और उनके बडे भाई भी गए थे। बिजली गुल हो जाने की वजह से सहगल ने गाने से मना कर दिया। रफी के बडे भाई ने आयोजकों से निवेदन किया कि भीड की व्यग्रता को शांत करने के लिए रफी को गाने का मौका दिया जाए। उनको अनुमति मिल गई और 13 वर्ष की आयु में मोहम्मद रफी का ये पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था। प्रेक्षकों ने श्याम सुंदर, जो उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे ने भी उनको सुना और काफी प्रभावित हुए।
उन्होंने मोहम्मद रफी को अपने लिए गाने का न्यौता दिया। रफी का प्रथम गीत एक पंजाबी फिल्म “गुल बलोच” के लिए था जिसे उन्होंने श्याम सुंदर के निर्देशन में 1944 में गाया। सन 1946 में मोहम्मद रफी ने मुंबई आने का फैसला किया। उन्हें संगीतकार नौशाद ने “पहले आप” नाम की फिल्म में गाने का मौका दिया। गायन सफर: 1950 के दशक में शंकर जयकिशन, नौशाद और सचिनदेव बर्मन ने रफी से उस समय के बहुत लोकप्रिय गीत गवाए। यह सिलसिला 1960 के दशक में भी चलता रहा। संगीतकार रवि ने रफी का साथ 1960 के दशक में दिया। 1960 में फिल्म “चौदहवीं का चांद” के शीर्षक गीत> के लिए रफी को अपना पहला फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद “घराना, काजल, दो बदन और नीलकमल” जैसी फिल्मों में इन दोनों की जोडी ने कई यादगार नगमें दिए। 1961 में रफी को अपना दूसरा फिल्मफेयर अवार्ड फिल्म “ससुराल”> के गीत “तेरी प्यारी प्यारी सूरत को” के लिए मिला। संगीतकार जोडी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपना आगाज ही रफी के स्वर से किया और 1963 में फिल्म “पारसमणि” के लिए बहुत सुंदर गीत बनाए। इनमें “सलामत रहो” तथा “वो जब याद आये(लता मंगेशकर के साथ)” उल्लेखनीय हैं।
1965 में ही लक्ष्मी-प्यारे के संगीत निर्देशन में फिल्म “दोस्ती” के लिए गाए गीत “चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेेरे” के लिए रफी को तीसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 1965 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा। 1965 में संगीतकार जोडी कल्याणजी-आनंदजी द्वारा फिल्म “जब जब फूल खिले” के लिए संगीतबद्ध गीत “परदेसियों से ना अखियां मिलाना” लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंच गया था। 1966 में फिल्म “सूरज” के गीत “बहारों फूल बरसाओं” बहुत प्रसिद्ध हुआ और इसके लिए उन्हें चौथा फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। इसका संगीत शंकर जयकिशन ने दिया था। 1968 में शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में फिल्म “ब्रह्मचारी” के गीत “दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर” के लिए उन्हें पाचवां फिल्मफेयर अवार्ड मिला। व्यक्तिगत जीवन: मोहम्मद रफी एक बहुत ही समर्पित मुस्लिम, व्यसनों से दूर रहने वाले तथा शर्मीले स्वभाव के आदमी थे। आजादी के समय विभाजन के दौरान उन्होंने भारत में रहना पसंद किया। उन्होंने बेगम विकलिस से शादी की और उनकी सात संतान हुई-चार बेटे तथा तीन बेटियां।
मोहम्मद रफी> को उनके परमार्थो के लिए भी जाना जाता हैं। अपने शुरूआती दिनों मे संगीतकार जोडी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए उन्होंने बहुत कम पैसों में गाया था। गानों की रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर के साथ उनका विवाद भी उनकी दरियादिली का सूचक हैं। उस समय लताजी का कहना था कि गाने गाने के बाद भी उन गानों से होने वाली आमदनी का एक अंश (रॉयल्टी) गायकों तथा गायिकाओं को मिलना चाहिए। रफी साहब इसके खिलाफ थे और उनका कहना था कि एक बार गाने रिकॉर्ड हो गए और गायक-गायिकाओं को उनकी फीस का भुगतान कर दिया गया हो तो उनको और पैसो की आशा नहीं करनी चाहिए। इस बात को लेकर दोनों महान कलाकारों के बीच मनमुटाव हो गया। लता ने रफी के साथ सेट पर गाने से मना कर दिया और बरसों तक दोनों का कोई युगल गीत नहीं आया।
बाद में अभिनेत्री नरगिस के कहने पर ही दोनों ने साथ गाना चालू किया और “ज्वैलर थीफ” फिल्म में “दिल पुकारे” गाना गाया। उनका देहान्त 31 जुलाई 1980 को हद्यगति रूक जाने के कारण हुआ। गीतों की संख्या: रफी ने अपने जीवन के कुल कितने गाने गाए इस पर कुछ विवाद है। 1970 के दशक में गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकाड्र्स ने लिखा कि सबसे अधिक गाने रिकार्ड करने का श्रेय लता मंगेशकर को प्राप्त हैं, जिन्होंने कुल 25,000 गाने रिकॉर्ड किये है। रफी ने इसका खण्डन करते हुए गिनीज बुक> को एक चिट्ठी लिखी। इसके बाद के संस्करणों में गिनीज बुक ने दोनों गायकों के दावे साथ-साथ प्रदर्शित किये, और रफी को 1944 और 1980 के बीच 28,000 गाने रिकार्ड करने का श्रेय दिया। इसके बाद हुई खोज में विश्वास नेरूरकर ने पाया कि लता ने वास्तव में 1989 तक केवल 5,044 गाने गाए थे। अन्य शोधकर्ताओं ने भी इस तथ्य को सही माना हैं।
इसके अतिरिक्त राजू भारतन ने पाया कि 1948 और 1987 के बीच केवल 35,000 हिंदी गाने रिकॉर्ड हुए। ऎसे में रफी ने 28,000 गाने गाए इस बात पर यकीन करना मुश्किल है, लेकिन कुछ स्त्रोत अब भी इस संख्या को उद्धृत करते हैं। इस शोध के बाद 1992 में गिनीज बुक ने गायन का उपरोक्त रिकार्ड बुक से निकाल दिया।
आज भी याद किए जा रहे है रफी साहब
दिसम्बर 25, 2009 khaskhabar द्वारा
