कलाकार: लारा दत्ता, विनय पाठक
निर्देशक : शशांक शाह
राजेश कुमार भगताणी
फिल्म समीक्षा : बहुत कोशिशों के बावजूद हम समय पर सिनेमा हॉल नहीं पहुंच पाए और जब चटक धूप से एकदम स्याह अंधेरे में सिनेमा हॉल में घुसे तो कुछ पल समझ में नहीं आया कि कहां आ गए हैं जब आंख कुछ संयत हुई तो नजर रूपहले परदे पर गई जहां रात का दृश्य नजर आया और कानों में सुनाई दिया क्या जयपुर में। ओ गॉड मुझे तो अब पता चल रहा है कि मैं जयपुर में हूं।
चलो दिल्ली की नायिका लारा दत्ता का यह संवाद इस बात का स्पष्ट संकेत था कि लेखक निर्देशक शशांक शाह ने फिल्म के टाइटल में दिल्ली और कथानक में जयपुर को आधार बनाया है।
लारा दत्ता निर्मित चलो दिल्ली परिस्थितिजन्य हास्य परिस्थितियों को झलकाती एक बेहद प्यारी फिल्म है जिसे दर्शक हंसते-हंसते देखता है और क्लाइमैक्स पर अपनी नम हुई आंखों को पोंछता है। तारीफ करेंगे लारा दत्ता की जिन्होंने व्यावसायिक सिनेमा में काम करने के बावजूद एक ऎसे विषय पर निर्माण की ठानी जिससे अन्य निर्माता कतराते हैं।
उन्होंने इस फिल्म में दो काम ऎसे किए हैं जिनके लिए वे बधाई की पात्र हैं एक फिल्म में ऎसे नायक (विनय पाठक) को लेना जिन पर नायकत्व झलकता नहीं है और दूसरा दर्शकों को अपनी पहली निर्देशित फिल्म में उबाऊपन का अहसास करा चुके शशांक शाह पर भरोसा करना जिन्होंने इस बार दर्शकों को जहां हंसाने में कामयाबी पायी है वहीं कुछ देर के लिए दर्शकों के मन में संवेदना भी जगायी है। एक अच्छा प्रयास है लारा का जिसे जितना सराहा जाए उतना कम है।

चलो दिल्ली का कथानक सामान्य सा है। एक अमीरजादी विमान की ग़डब़डी के कारण दिल्ली के स्थान पर जयपुर उतरती है और अपने घर दिल्ली पहुंचने की जद्दोजहद में उसे किन-किन परिस्थितियों का सामना करना प़डता है इन्हीं का खूबसूरत चित्रण है चलो दिल्ली में। यहां कोई नायक नायिका का पात्र नहीं है बल्कि दो किरदार हैं जो अलग-अलग तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं। यात्रा के दौरान इन दोनों में एक अनचाहा अजीब सा रिश्ता जु़डता है।
निर्देशक शशांक ने अपनी कथा से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि जीवन एक यात्रा है जिसमें विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों का आपस में मेल होता है। इनमें कुछ अच्छे कुछ बुरे दोनों प्रकार के होते हैं और कुछ ऎसे होते हैं जो अपनी दुखी होने के बावजूद दूसरों को सुख देने का प्रयास करते हैं। इस यात्रा में कई ऎसे रिश्ते पनपते हैं जो पति-पत्नी के रिश्ते से इतर होते हैं।
फिल्म का सबसे आकर्षक पहलू इसकी बेमेल जो़डी है।

विनय पाठक और लारा दत्ता की यह जो़डी दर्शकों को पसन्द आती है। पूरी फिल्म को इन दोनों ने सफलतापूर्वक अपने कंधों पर उठाया है और कहीं भी बोझिलता का अहसास नहीं होने दिया है।
एक तरफ जहां लारा का अभिनय प्रभावी हैं वहीं विनय पाठक का सहज और जिंदादिल इंसान का चरित्र अपनी एक अलग ही पहचान छो़डता है।
फिल्म का तीसरा पात्र विक्रम है जो पहले दृश्य से नजर न आते हुए भी दर्शकों के दिमाग में छाप छो़डता है और अन्त के कुछ मिनटों में परदे पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराता है।

चुस्त सम्पादन के साथ बेहतर छायांकन और फिल्म के अनुरूप गीत संगीत एक खुशनुमा माहौल को अंजाम देते हैं। निर्देशन कसावट लिए है। कहीं कोई बोझिलता या भारीपन नजर नहीं आता। फिल्म के संवाद सामान्य हैं लेकिन उनमें वजन है। अपने वजन के अनुरूप यह संवाद दर्शकों के दिल पर असर करते हैं। मसलन व्यक्ति को परिस्थिति के अनुरूप जीना चाहिए अगर वह नहीं जी सकता तो उसका बदले और जब बदले नहीं पाता है तो उसे स्वीकार करें तभी उसका जीवन बिना तनाव के चलेगा वरना सिर्फ टेंशन ही टेंशन है। कहना प़डेगा कि अपने प्रथम प्रयास में लारा दत्ता ने बतौर निर्मात्री बॉलीवुड में सशक्त कदम रखा है।

उम्मीद करते हैं आगे भी वे इसी तरह से फिल्मों का निर्माण करेंगी। बॉक्स ऑफिस पर चलो दिल्ली मास को प्रभावित करेगी। यह फिल्म उस वर्ग के लिए है जो कुछ हटकर देखना पसन्द करता है। यह उन दर्शकों को पसन्द आएगी जिन्होंने भेजा फ्राइ को परवान चढ़ाया था।

