क्या कूल है हम जैसी सैक्स कॉमेडी बनाने वाली एकता कपूर ने धीरे-धीरे बॉलीवुड में कुछ ऎसे विषयों पर फिल्मों का निर्माण शुरू किया है जिनके लिए हम उनके तहे-दिल से शुक्रगुजार है। गत वर्ष प्रदर्शित वन्स अपॉन ए टाइम के बाद तो उनके बैनर की फिल्म के लिए कुछ आशाएं ज्यादा ही बन जाती हैं।
इस सप्ताह एक तरफ जहां लारा दत्ता की चलो दिल्ली ने उम्मीद जगायी, वहीं एकता कपूर की शोर इन द सिटी ने युवा फिल्मकारों द्वारा नए विषय पर नई सोच को तर्क के आधार पर प्रस्तुत करने के मंथन से यह संकेत दिया है कि आने वाले कुछ वर्षो में निश्चित तौर पर बॉलीवुड को कोई ऎसी फिल्म ही ऑस्कर में छायेगी जिसे यहां के दर्शक नकारेगें लेकिन पश्चिमी दर्शक और समालोचक सराहेंगे।
शोर इन द सिटी मुख्य रूप से पांच ऎसे युवाओं की कहानी है जो अलग-अलग होते हुए भी एक ही डोर से बंधे हैं।
फिल्म के केन्द्र में आतंक का साया है लेकिन कुछ इस तरह से जिसके प्रति दर्शकों में बेबसी उभरती है।
इस फिल्म के निर्देशक राज निदिमोरू और कृष्णा डीके ने दो साल पहले अपनी पहली निर्देशित फिल्म 99 जो क्रिकेट सट्टेबाजी पर थी, के जरिए जब बॉलीवुड में कदम रखा था तो यह अहसास हो गया था कि इस जो़डी का फिल्म मेकिंग स्टाइल अलग है।
इसी बात को एक बार फिर से सिद्ध करते हुए इस युवा निर्देशक जो़डी ने दर्शकों में शोर इन द सिटी के माध्यम से अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। फिल्म का हर दृश्य अपनी अहमियत रखता है। हर किरदार कहानी में इस तरह से फिट है जैसे फ्रेम में फोटो फिट होती है। निर्देशन के साथ-साथ इस फिल्म की कथा पटकथा भी इन्हीं दोनों की है। पूरी फिल्म को उन्होंने इस तरह पक़डा है कि दर्शक शुरूआत से लेकर अन्त तक पर्दे पर एकटक निहारता रहता है। निर्देशन असरदार और अभिनय बेमिसाल है।
अभिनय की बात पर तो हम कह सकते हैं कि भावहीन चेहरे वाले तुषार कपूर ने भी अपनी इस होम प्रोडक्शन फिल्म में संजीदा अभिनय किया है।
एनआरआई व्यापारी सेंडिल राममूर्ति ने बेबस व्यापारी के किरदार को जीवन्तता के साथ पेश किया है। यह सही है कि यहां हर अभिनेता ने अपनी छाप छो़डी है लेकिन सबसे ज्यादा प्रशंसा पाने वाले रहे हैं मंडूक का किरदार निभाने वाले पिताबश त्रिपाठी।
इस अदाकार ने अपने चरित्र को कुछ ऎसे अंदाज में पेश किया है कि फिल्म के पहले दृश्य से दर्शकों में इनको देखकर खीझ उत्पन्न होती है। यह एक अभिनेता के कमाल के अभिनय का उदाहरण होता है जब दर्शक उसकी किसी भूमिका में इस तरह समाहित हो जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि पिताबश त्रिपाठी जब-जब परदे पर आया फिल्म में रोचकता और कुछ हास्य उत्पन्न हुआ है।

प्रीति देसाई को यहां करने के लिए कुछ नहीं था। तुषार और राधिका के बीच प्रेम के समस्त दृश्यों पर सेंसर बोर्ड की कैंची चली है। अंडर-19 क्रिकेट टीम में आने को बेकरार युवक सावन के रूप में सुदीप किशन का अभिनय भी अच्छा है।
फिल्म के गीत धीमे-धीमे और साईबो पाश्र्व में बजाए गए हैं जो अपने संगीत की वजह से कर्णप्रिय लगते हैं। संगीतकार सचिन जिगर और हरप्रीत ने रॉक फ्यूजन की झलक पेश की है। अपराधिक पृष्ठभूमि की फिल्मों में पाश्र्व संगीत का विशेष महžव होता है यहां भी बैकग्राउंड संगीत दृश्यों को जीवंतता प्रदान करता है। इस फिल्म का क्लाइमैक्स बेहद असरकारक है। पूरी फिल्म एक संदेश देती चलती है कि जिन्दगी में हर इंसान को एक ऎसा मौका जरूर मिलता है जिसके द्वारा वो अपनी जिन्दगी को बदल सकता है।

चार कहानियां चार मौके और पांच किरदार। इस चरित्र ने इस संदेश को सशक्तता के साथ पेश किया है। फिल्म का छायांकन वास्तविक लोकेशंस को खूबसूरती के साथ उभारता है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बॉलीवुड अब बदल रहा है। उसकी सोच का दायरा बदलते सामाजिक परिवेश को पेश करने लगा है। शोर इन द सिटी के निर्देशक राज निदिमोरू और कृष्णा डीके ने सशक्तता के साथ आज की युवा पीढ़ी की सोच और कार्यशैली को पूरी ईमानदारी के साथ पर्दे पर उतारा है। शोर इन द सिटी इस प्रकार की फिल्म है जिसे हर उस दर्शक को देखना चाहिए जो सिनेमा में वास्तविकता को चाहता है। निश्चित रूप से यह अपने आप में मस्ट वॉच फिल्म है। हालांकि इस तरह की फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर निराशा ही हाथ लगती है।



