फिल्म समीक्षा -
राजेश कुमार भगताणी
कलाकार : शेफाली शाह, राहुल बोस, नीतू चंद्रा, सुमीत
निर्माता : विपुल अमृतलाल शाह
निर्देशक: बरनाली रे शुक्ला
पिछले कुछ समय में बॉलीवुड में नई महिला निर्देशकों का आगमन ऎसी फिल्मों के साथ हुआ है जिनका विषय बेहद गम्भीर रहा है। पिछले साल आई नंदिता दास की फिराक, पत्रकार से निर्देशक बनी अनुष्का रिजवी की पीपली लाइव, लगान की सहायक रही किरण राव की धोबी घाट और अब इस सप्ताह प्रदर्शित हुई निर्देशक बरनाली रे शुक्ला की कुछ लव जैसा भी ऎसी ही फिल्म है जिसका विषय आम व्यावसायिक सिनेमा से हटकर है। ऎसी फिल्में एक सीमित वर्ग देखता है, सराहता है। सहायक निर्देशक के रूप में राम गोपाल वर्मा के साथ काम करने के बावजूद बरनाली रे ने अपने आपको रामगोपाल से मुक्त रखा है। यहां उनकी संजीदा सोच व नजर का प्रभाव साफ देखा जा सकता है। फिल्म की कहानी उन महिलाओं पर है जिनके लिए कहा जाता है कि घर पर रहते हुए करती क्या हो जबकि वे घर की धुरी होती हैं। इसके बावजूद उन्हें प्यार नहीं मिलता। फिल्म एक संदेश देती है कि हर व्यक्ति प्यार का भूखा होता है, फिर चाहे वह सामान्य हो, कामकाजी महिला हो या घरेलू महिला या फिर अपराध की राह पर चलता हुआ कोई नौजवान हो।

निर्देशक ने फिल्म के हर पात्र और उसके दृश्यों को संजीदगी के साथ गढा है। सबसे बडी बात यह है कि इस पूरी फिल्म में कोई भी अतिरिक्त पात्र नहीं रखा गया है। फिल्म की कहानी मधु नामक घरेलू औरत पर केन्द्रित है जो तन-मन से अपने परिवार की खुशियों का ख्याल रखती है और चाहती है कि कोई तो ऎसा हो जो उसका भी ख्याल करे। हर चार साल में आने वाले अपने जन्म दिन पर जब पति की बेरूखी देखती है तो वह अपना जन्म दिन अपनी इच्छा से बिताना चाहती है। इसी इच्छा से वह घर से बाहर निकलती है जहां उसकी मुलाकात राघव से होती है जो एक अपराधी है लेकिन सुधरना चाहता है। उसका जन्म दिन भी चार साल में एक बार आता है।

मधु पूरा दिन उसके साथ गुजारती है। निर्देशिका ने इन दोनों की मुलाकात को बडे रोचक अंदाज में पेश किया है। यही फिल्म का दिलचस्प मोड है। 29 फरवरी के फेर में दो अनजाने मिलते हैं। फिर दोनों पूरा एक दिन साथ गुजारते हैं। इस एक दिन की मुलाकात में उनमें कुछ होता है, कुछ भावनाएं-इच्छाएं जागृत होती हैं। इन्हीं इच्छाओं और भावनाओं को बरनाली रे शुक्ला ने कुछ लव जैसा नाम दिया है। फिल्म का क्लाइमैक्स बेहतरीन है। कभी-कभी फिल्मों में नजर आने वाली शेफाली शाह ने बेहतरीन अभिनय किया है। विशेषकर अन्तिम दृश्यों में उन्होंने अविस्मरणीय अभिनय किया है। राहुल बोस सीमित फिल्में करते हैं लेकिन जब वे आते हैं अपनी छाप छोड जाते हैं। यहां भी उन्होंने संवादों का सहारा कम लिया है लेकिन भावाभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि दर्शक के मुंह से उनके लिए वाह ही निकलती है। फिल्म का छायांकन औसत है। गीत-संगीत के स्तर पर फिल्म कमजोर है। अलग सोच और नए विषयों पर फिल्म देखने के शौकीन दर्शकों को इसे समय निकाल कर जरूर देखना चाहिए।

कुछ लव जैसा : सशक्त कथा-पटकथा और निर्देशन
मई 30, 2011 khaskhabar द्वारा
hi sir thes is not my emil adres only i see the fesbook my nem is prakash jodnar
ok ba…bay