अमिताभ बच्चन (जन्म-11 अक्टूबर)
राज कपूर, दिलीप कुमार, देव आनन्द, राजेन्द्र कुमार, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, शत्रुƒन सिन्हा, विनोद मेहरा, मिथुन चक्रवर्ती, अनिल कपूर, सलमान, आमिर, शाहरूख, अक्षय, अजय देवगन, गोविंदा, ऋतिक, नील नितिन मुकेश और बहुत से नए कलाकार। फेहरिस्त और भी लम्बी है और बढती जायेगी पर एक नाम है जो शायद जस का तस है अमिताभ हरिवंश राय बच्चन जिसे कोई कुमार, कोई खान और कोई कपूर बॉलीवुड की बादशाहत की कुर्सी से डिगा नही पाया है। ना जाने क्यों इतने अच्छे-अच्छे कलाकार जब अमिताभ के साथ काम करते हैं या खडे होते हैं तो तुलना करना अतिशयोक्ति लगती है। कद ऊंचा होने के साथ-साथ उनका बडप्पन, उनकी सादी जीवन शैली, जमीन से जुडे रहना, उनकी नेक नियत, सादा स्वभाव और मृदुभाषी होना उन्हें और भी बडा बना देता है। ताज्जुब नहीं की अगर मीडिया उन्हें बॉलीवुड का शहंशाह या बॉलीवुड का बाप कहे।
1970 के दशक के दौरान उन्होंने बडी लोकप्रियता प्राप्त की और तब से भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे प्रमुख व्यक्तित्व बन गए हैं। बच्चन ने अपने कैरियर में कई पुरस्कार जीते हैं, जिनमें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और बारह फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल हैं। उनके नाम सर्वाधिक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता फिल्मफेयर अवार्ड का रिकार्ड है। अभिनय के अलावा बच्चन ने पाश्र्व गायक, फिल्म निर्माता और टीवी प्रस्तोता और भारतीय संसद के एक निर्वाचित सदस्य के रूप में 1987 से 1984 तक भूमिका की हैं। इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, में जन्मे अमिताभ बच्चन हिंदू कायस्थ परिवार से संबंध रखते हैं। उनके पिता, हरिवंश राय बच्चन प्रसिद्ध हिन्दी कवि थे, जबकि उनकी माँ तेजी बच्चन कराची के सिख परिवार से संबंध रखती थीं। बचपन में अमिताभ बच्चन का नाम इंकलाब रखा गया था, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रयोग में किए गए प्रेरित वाक्यांश इंकलाब जिंदाबाद से लिया गया था। लेकिन बाद में इनका अमिताभ रखा गया जिसका अर्थ है, ऎसा प्रकाश जो कभी नहीं बुझेगा। यद्यपि इनका उपनाम श्रीवास्तव था, लेकिन पिता हरिवंश राय ने इस उपनाम को अपने कृतियों को प्रकाशित करने वाले बच्चन नाम से उद्धृत किया। यह उनका अंतिम नाम ही है जिसके साथ उन्होंने फिल्मों में एवं सभी सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए उपयोग किया। अब यह उनके परिवार के समस्त सदस्यों का उपनाम बन गया है। अमिताभ, हरिवंश राय बच्चन के दो बेटों में सबसे बडे हैं। उनके दूसरे बेटे का नाम अजिताभ है। इनकी माता की थिएटर में गहरी रूचि थी और उन्हें फिल्म में भी रोल की पेशकश की गई थी किंतु इन्होंने गृहणी बनना ही पसंद किया।
अमिताभ के कैरियर के चुनाव में इनकी माता का भी कुछ हिस्सा था, क्योंकि वे हमेशा इस बात पर भी जोर देती थी कि उन्हें सेंटर स्टेज को अपना कैरियर बनाना चाहिए। अमिताभ बच्चन के पिता का देहांत 2003 में हो गया था, जबकि उनकी माता की मृत्यु 21 दिसम्बर 2007 को हुई थीं। बच्चन ने दो बार एम.ए. की उपाधि ग्रहण की है। मास्टर ऑफ आर्ट्स (स्नातकोत्तर) इन्होंने इलाहाबाद के ज्ञान प्रबोधिनी और बॉयज हाई स्कूल (बीएचएस) तथा उसके बाद नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में पढाई की जहाँ कला संकाय में प्रवेश दिलाया गया। अमिताभ बाद में अध्ययन करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोडीमल कॉलेज चले गए जहां इन्होंने विज्ञान स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपनी आयु के 20 के दशक में बच्चन ने अभिनय में अपना कैरियर आजमाने के लिए कोलकाता की एक शिपिंग फर्म बर्ड एंड कंपनी में किराया ब्रोकर की नौकरी छोड दी। आरंभिक कार्य 1969 -1972 बच्चन ने फिल्मों में अपने कैरियर की शुरूआत ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में बनी सात हिंदुस्तानी के सात कलाकारों में एक कलाकार के रूप में की, उत्पल दत्त, मधु और जलाल आगा जैसे कलाकारों के साथ अभिनय कर के। फिल्म ने वित्तीय सफलता प्राप्त नहीं की पर बच्चन ने अपनी पहली फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ नवागंतुक का पुरस्कार जीता। इस सफल व्यावसायिक और समीक्षित फिल्म के बाद उनकी एक और आनंद (1971) नामक फिल्म आई जिसमें उन्होंने उस समय के लोकप्रिय कलाकार राजेश खन्ना के साथ काम किया।
डॉ. भास्कर बनर्जी की भूमिका करने वाले बच्चन ने कैंसर के एक रोगी का उपचार किया जिसमें उनके पास जीवन के प्रति वेबकूफी और देश की वास्तविकता के प्रति उसके दृष्टिकोण के कारण उसे अपने प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद अमिताभ ने (1971) में बनी परवाना में एक मायूस प्रेमी की भूमिका निभाई जिसमें इसके साथी कलाकारों में नवीन निश्चल, योगिता बाली और ओम प्रकाश थे और इन्हें खलनायक के रूप में फिल्माना अपने आप में बहुत कम देखने को मिलने जैसी भूमिका थी। इसके बाद उनकी कई फिल्में आई जो बॉक्स ऑफिस पर उतनी सफल नहीं हो पाई जिनमें रेशमा और शेरा (1971) भी शामिल थी और उन दिनों इन्होंने गुड्डी फिल्म में मेहमान कलाकार की भूमिका निभाई थी। इनके साथ जया भादुडी, धर्मेन्द्र थे। 1972 में निर्देशित एस. रामनाथन द्वारा निर्देशित कामेडी फिल्म बॉम्बे टू गोवा में भूमिका निभाई। इस फिल्म में इनकी नायिका अरूणा ईरानी थी। महमूद, अनवर अली और नासिर हुसैन जैसे कलाकारों के साथ कार्य किया है। अपने संघर्ष के दिनों में वे 7 (सात) वर्ष की लंबी अवधि तक अभिनेता, निर्देशक एवं हास्य अभिनय के बादशाह महमूद साहब के घर में रूके रहे। अमिताभ बच्चन की पहली सुपर हिट फिल्म प्रदर्शित हुई जंजीर, जिसके निर्देशक प्रकाश मेहरा थे। 1973 में जब प्रकाश मेहरा ने जंजीर में इंस्पेक्टर विजय खन्ना की भूमिका के रूप में अवसर दिया और यहीं से अमिताभ के करियर में नया मोड आया। इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन को एंग्री यंगमैन के रूप में स्थापित किया। बॉक्स ऑफिस पर सफलता पाने वाले एक जबरदस्त अभिनेता के रूप में यह उनकी पहली फिल्म थी, जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ पुरूष कलाकार के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए मनोनीत करवाया। 1973 ही वह साल था जब इन्होंने 3 जून को जया से विवाह किया और इसी समय ये दोनों न केवल जंजीर में बल्कि एक साथ कई फिल्मों में दिखाई दिए।
जया भादुडी से शादी करने के बाद सबसे पहले प्रदर्शित होने वाली उनकी फिल्म थी, अभिमान जो इनकी शादी के केवल एक मास बाद ही रिलीज हो गई थी। इस फिल्म के गीत लूटे कोई मन का सफर बनके मेरा साथी ने अपने बेहतरीन शब्दों और कर्णप्रिय धुन से श्रोताओं को पिछले 38 साल से दीवाना बना रखा है। आज भी जब कभी यह गीत रेडियो पर सुनाई देता है तो मन बाग-बाग हो जाता है। न चाहते हुए भी मन इस गीत को गुनगुनाने लगता है। बाद में ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन तथा बीरेश चटर्जी द्वारा लिखित नमक हराम फिल्म में विक्रम की भूमिका मिली, जिसमें दोस्ती के सार को प्रदर्शित किया गया था। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन एक बार फिर से सुपर स्टार राजेश खन्ना के साथ परदे पर नजर आए। (आनन्द के बाद यह उनके साथ दूसरी और अपने अब तक के करियर की अन्तिम फिल्म रही है। इस फिल्म के बाद राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन को कोई निर्देशक साथ में परदे पर नहीं ला पाया। अफसोस दो सितारों के अहम् ने दर्शकों को उनकी बेहतरीन परफार्मेस देखने से महरूम कर रखा है।) राजेश खन्ना और रेखा के विपरीत इनकी सहायक भूमिका में इन्हें बेहद सराहा गया और इन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया। 1974 की सबसे बडी फिल्म “रोटी कपडा और मकान” में सहायक कलाकार की भूमिका करने के बाद बच्चन ने बहुत सी फिल्मों में कई बार मेहमान कलाकार की भूमिका निभाई जैसे “कुंवारा बाप” और “दोस्त”। मनोज कुमार द्वारा निदेशित और लिखित फिल्म जिसमें दमन और वित्तीय एवं भावनात्मक संघर्षो के समक्ष भी ईमानदारी का चित्रण किया गया था, वास्तव में आलोचकों एवं व्यापार की दृष्टि से एक सफल फिल्म थी और इसमें सह कलाकार की भूमिका में अमिताभ के साथी के रूप में मनोज कुमार स्वयं और शशि कपूर एवं जीनत अमान थीं।
बच्चन ने 6 दिसंबर 1974 को प्रदर्शित मजबूर फिल्म में बतौर नायक काम किया। जंजीर के बाद यह उनकी दूसरी ऎसी फिल्म थी जिसमें वे एकल नायक के रूप में नजर आए थे। रवि टण्डन के निर्देशन में बनी मजबूर हॉलीवुड फिल्म जिगजेग पर आधारित थी। कहना यह चाहिए कि आधारित तो क्या उसकी नकल थी। हॉलीवुड फिल्म में जार्ज कैनेडी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। मजबूर बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं कर सकी। अमिताभ की अभिनय प्रतिभा को सबसे ज्यादा ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी फिल्मों में भुनाया। 1975 में ऋषिकेश मुखर्जी ने अमिताभ को धर्मेन्द्र, शर्मिला टैगोर और जया के साथ चुपके-चुपके नामक फिल्म में पेश किया। चुपके-चुपके क्लासिकल फिल्मों में अपना एक अलग मुकाम रखती है। परिस्थितिजन्य हास्य पर इससे बेहतरीन फिल्म बॉलीवुड में अन्य कोई शायद ही आई हो। 1975 में अमिताभ ने जहां चुपके-चुपके की, वहीं उन्होंने अपराध पर बनी फिल्म फरार और रोमांस से भरपूर फिल्म मिली में अपने अभिनय के जौहर दिखाए।
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अक्टूबर 12, 2011 khaskhabar द्वारा