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Archive for दिसम्बर, 2011

11 दिसंबर 2011 को दिलीप कुमार 89 वर्ष के हो गएं। उन्हें ट्रेजेडी किंग कहा जाता है क्योंकि ट्रेजेडी को उन्होंने बखूबी पर्दे पर पेश किया। उन्हें अभिनय सम्राट कहा जाता है क्योंकि ये माना जाता है कि हिंदी फिल्म में उनके जैसा बेजोड अभिनेता और कोई दूसरा नहीं हुआ है। दिलीप कुमार के अभिनय की नकल कई कलाकारों ने की, जिनमें मनोज कुमार, राजेन्द्र कुमार, अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरूख खान तक शामिल हैं। कई कलाकारों ने स्वीकारा की न चाहते हुए भी वे इस महान अभिनेता से प्रभावित हो गए। दिलीप साहब चेहरे के भावों के जरिये ही बिना संवाद के ही कई बातें बोल दिया करते हैं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चने भी मानते हैं कि उनके आदर्श दिलीप कुमार हैं। जन्म के लिहाज से वह उनसे 20 साल बडे हैं लेकिन पेशे में मुझसे 2000 साल आगे हैं। वह मेरे आदर्श हैं और तब से हैं जब मैंने उनका काम पहली देखा। “शक्ति” फिल्म में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन जैसे दो महान अभिनेता आमने-सामने थे। अमिताभ को केवल दिलीप कुमार की आँखों में देखना था, लेकिन इस आसान से शॉट देने में उन्हें 22 रीटेक लगे। अमिताभ का कहना था कि दिलीप साहब की आँखों में झाँककर वे सब कुछ भूल जाते थे और बेहद नर्वस हो गए थे।
शाहरूख खान पर भी दिलीप कुमार का प्रभाव रहा है। दिलीप कुमार ने एक बार कहा भी है कि वे युवा अवस्था में शाहरूख जैसे दिखाई देते थे और ऎसा ही अभिनय करते थे। शाहरूख के बारे में सायरा बानो का कहना है कि यदि उनका बेटा होता तो वो शाहरूख जैसा ही होता। इस समय दिलीप कुमार की याददाश्त कमजोर हो गई है और पुरानी यादें धुँधली पड गई हैं। उनके निकटतम लोगों का कहना है कि वे किसी घटना के बारे में बताते-बताते दूसरी घटना के बारे में बात करने लगते हैं। लेकिन लोग उनसे बातें करना चाहते हैं। उन्हें सुनना चाहते हैं। लेकिन उनका स्वास्थ्य इस बात की इजाजत नहीं देता है और वे अपने बंगले में ही रहते हैं। धर्मेन्द्र अक्सर दिलीप साहब के बंगले पर जाते हैं और उनकी पसंद का खाना साथ ले जाते हैं। धर्मेन्द्र खुद एक बडे अभिनेता हैं, लेकिन अभी भी वे दिलीप साहब के पैरों में बैठकर उनसे बातें करते हैं। बॉलीवुड के कुछ पुराने कलाकार भी उनके हाल-चाल जानने के लिए उनके पास जाते हैं। इस अभिनय सम्राट की लंबी उम्र की कामना करते हुए हम उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं।

मेला, शहीद, अंदाज, आन, देवदास, नया दौर, मधुमती, यहूदी, पैगाम, मुगल-ए-आजम, गंगा-जमना, लीडर तथा राम और श्याम जैसी फिल्मों के सलोने नायक दिलीप कुमार स्वतंत्र भारत के पहले दो दशकों में लाखों युवा दर्शकों के दिलों की धडकन बन गए थे। अब तक भारतीय उपमहाद्वीप के करोडों लोग पर्दे पर उनकी चमत्कारी अभिनय कला का जायजा ले चुके हैं। सभ्य, सुसंस्कृत, कुलीन इस अभिनेता ने रंगीन और रंगहीन (श्वेत-श्याम) सिनेमा के पर्दे पर अपने आपको कई रूपों में प्रस्तुत किया। असफल प्रेमी के रूप में उन्होंने विशेष ख्याति पाई, लेकिन यह भी सिद्ध किया कि हास्य भूमिकाओं में वे किसी से कम नहीं हैं। वे ट्रेजेडी किंग भी कहलाए और ऑलराउंडर भी। उनकी गिनती अतिसंवेदनशील कलाकारों में की जाती है, लेकिन दिल और दिमाग के सामंजस्य के साथ उन्होंने अपने व्यक्तित्व और जीवन को ढाला। वे अपने आप में स्वनिर्मित मनुष्य की जीती-जागती मिसाल हैं। उनकी निजी जिन्दगी हमेशा कौतुहल का विषय रही, जिसमें रोजमर्रा के सुख-दु:ख, उतार-चढाव, मिलना-बिछुडना, इकरार-तकरार सभी शामिल थे। ईश्वर-भीरू दिलीप कुमार को साहित्य, संगीत और दर्शन की अभिरूचि ने गंभीर और प्रभावशाली हस्ती बना दिया। पच्चीस वर्ष की उम्र में दिलीप कुमार ने अपने को भारतीय फिल्म उद्योग का पहला सितारा बना लिया था। वह आजादी का उदयकाल था। दिलीप कुमार की सितारा हैसियत अभी शैशवावस्था में ही थी कि फिल्म उद्योग में राजकपूर और देव आनंद का आगमन हुआ और थोडे ही अन्तराल में फिल्म उद्योग में दिलीप-राज-देव की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति का निर्माण हुआ। ये नए चेहरे आम सिने दर्शकों को मोहक लगे। इनसे पूर्व के अधिकांश हीरो प्रौढ नजर आते थे। दिलीप कुमार प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्था बॉम्बे टॉकिज की उपज हैं, जहाँ देविका रानी ने उन्हें काम और नाम दिया। यहीं वे यूसुफ सरवर खान से दिलीप कुमार बने और यहीं उन्होंने अभिनय का ककहरा सीखा। अशोक कुमार और शशधर मुखर्जी ने फिल्मिस्तान की फिल्मों में लेकर दिलीप कुमार के करियर को सही दिशा में आगे बढाया। फिर नौशाद, मेहबूब, बिमल राय, के. आसिफ तथा दक्षिण के एसएस वासन ने दिलीप की प्रतिभा का दोहन कर क्लासिक फिल्में देश को दीं। 44 साल की उम्र में अभिनेत्री सायरा बानो से विवाह करने तक दिलीप कुमार वे सब फिल्में कर चुके थे, जिनके लिए आज उन्हें याद किया जाता है।
बाद में दिलीप कुमार ने कभी काम और कभी विश्राम की कार्यशैली अपनाई। वैसे वे इत्मीनान से काम करने के पक्षधर शुरू से थे। अपनी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को दिलीप कुमार ने पैसा कमाने के लिए कभी नहीं भुनाया। आज ज्यादातर लोगों को इस बात पर आpर्य होता है कि इस महानायक ने सिर्फ 54 फिल्में क्यों की। लेकिन इसका उत्तर है दिलीप कुमार ने अपनी इमेज का सदैव ध्यान रखा और अभिनय स्तर को कभी गिरने नहीं दिया। इसलिए आज तक वे अभिनय के पारसमणि बने हुए हैं जबकि धूम-धडाके के साथ कई सुपर स्टार, मेगा स्टार आए और आकर चले गए। दिलीप कुमार ने अभिनय के माध्यम से राष्ट्र की जो सेवा की, उसके लिए भारत सरकार ने उन्हें 1991 में पद्मभूषण की उपाधि से नवाजा था और 1995 में फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फालके अवॉर्ड भी प्रदान किया। पाकिस्तान सरकार ने भी उन्हें 1997 में निशान-ए-इम्तियाज से नवाजा था, जो पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। 1953 में फिल्म फेयर पुरस्कारों के श्रीगणेश के साथ दिलीप कुमार को फिल्म दाग के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था।
अपने जीवनकाल में दिलीप कुमार कुल आठ बार फिल्म फेयर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार पा चुके हैं और यह एक कीर्तिमान है जिसे अभी तक तोडा नहीं जा सका। अंतिम बार उन्हें सन् 1982 में फिल्म शक्ति के लिए यह इनाम दिया गया था, जबकि फिल्म फेयर ने ही उन्हें 1993 में राज कपूर की स्मृति में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया। फिल्म फेयर ने जिन छह अन्य फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया वे हैं आजाद (1955), देवदास (1956), नया दौर (1957), कोहिनूर (1960), लीडर (1964) तथा राम और श्याम (1967)। 1997 में उन्हें भारतीय सिनेमा के बहुमूल्य योगदान देने के लिए एनटी रामाराव अवॉर्ड दिया गया, जबकि 1998 में समाज कल्याण के क्षेत्र में योगदान के लिए रामनाथ गोयनका अवॉर्ड दिया गया।
दिलीप कुमार फिल्म जगत की अजीमुश्शान हस्ती हैं। उन्हें अभिनय का पर्यायवाची माना जाता है। अपनी समस्त फिल्मों में उन्होंने दिल लगाकर काम किया और अनेक किरदारों में जीवंत प्रस्तुति दी। आरंभिक अनेक फिल्मों में उन्होंने निराश प्रेमी की छवि को प्रस्तुत किया, इसलिए उन्हें ट्रेजेडी किंग कहा गया। दर्दभरी दास्तानों को दोहराते-दोहराते उनकी यह हालत हो गई थी कि दर्द उनके अंदर तक पहुँच गया था और वे संभ्रम की स्थिति में जाने लगे थे। निराशावादी मन:स्थिति से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने अपने करियर के आरंभिक वर्षो में ही लंदन के एक मनोचिकित्सक से संपर्क करके उपचार पूछा तो उन्हें सलाह दी गई कि ट्रेजेडी के साथ ही कॉमेडी फिल्में भी करते रहें। डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने आजाद, कोहिनूर, आन, नया दौर फिल्मों में खिलंदड प्रेमी की भूमिकाएँ निभाई। नया दौर फिल्म का गीत “उडे जब-जब जुल्फें तेरी” युवा दिलीप कुमार का सटीक चित्रण है। दर्शकों का उनके प्रति दीवानगी का यही आलम था। दाग और आन, देवदास और आजाद, मुगल-ए-आजम और कोहिनूर जैसी विपरीत स्वभाव वाली उनकी फिल्में आमने-सामने ही रिलीज हुई थीं। एक तरफ वे दर्शकों को पीडा की सुखानुभूति देते, तो दूसरी तरफ लोगों का मनोरंजन करते। किसी भी नट की यह विवशता ही होती है। अपने साथ वे नाटकीयता का एक तूफान लेकर आए थे। फिल्मों में उनके नए-नए रूप देखकर दर्शक दंग रह जाते थे। अभिनय के प्रति दिलीप कुमार का रवैया सदा पूर्णतावादी रहा। युवावस्था में वे फिल्मों के प्राणाधार होते थे तो अपने दूसरे दौर की प्रौढ भूमिकाओं में भी उन्होंने नवीनताएँ दीं। राम और श्याम में उन्होंने डबल रोल किया और बैराग में तीन भूमिकाएँ की। बैराग (1976) के बाद उन्होंने पाँच साल का अवकाश मनाया और मनोज कुमार की क्रांति (1981) से फिल्मों में उनकी वापसी हुई। दिलीप कुमार को अभिनय का मदरसा भी कहा गया। अपनी वापसी में उन्होंने क्रांति के बाद सर्वाधिक प्रसिद्धि स्वयंभू शो मैन कहलाने वाले निर्माता निर्देशक सुभाष घई की विधाता (1982) से पाई। इस फिल्म में उन्होंने माफिया डॉन शमशेर सिंह के किरदार को जिस अंदाज में परदे पर पेश किया वैसा तो शायद महानायक माने जाने वाले अमिताभ बच्चन भी न कर पाए हैं। सुभाष घई पहले ऎसे निर्देशक रहे जिन्होंने शोले के कथानक को एक रूप में लेकर “कर्मा” का निर्माण किया और इस फिल्म में जेलर की भूमिका दिलीप कुमार को निभाने के लिए दी। कर्मा (1986) की कहानी में आतंकवाद को शामिल किया गया, जो उस समय भारत में चरम पर था। इस फिल्म में दिलीप कुमार के सामने अनुपम खेर ने खलनायक डॉ. डेंग की भूमिका अभिनीत की थी। इन दोनों सितारों के आमने-सामने के दृश्य आज भी दर्शकों के जेहन में घूमते हैं। विशेषकर बिना किसी संवाद के दिलीप कुमार का अनुपर खेर को थप्पड मारने वाला दृश्य अविस्मरणीय दृश्य है।

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ये टॉपलैस हसीनाएं उडा देंगी आपके होश

बॉलिवुड की कई सुदरियां ऎसी है जो पर्दे पर तो हिट हुई लेकिन अपने हुस्त्र के जलवों से भी उन्होनें सबका मन मोह लिया। इन बालाओं ने टॉपलैस और बोल्ड पोज देकर लोगों को अपने हुस्त्र का दीवाना बना लिया। देखिए ऎसी कुछ हॉट बॉलिवुड बालाएं।

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नरगिस फाखरी:

बॉलिवुड में हाल ही में एंट्री करने वाली नरगिस बोल्ड सीन देने में पीछे नहीं रहती है। यह विवादों से घिरे रहने वाली हॉटेस्ट इम्पोर्ट है। नरगिस जल्द ही रणबीर कपूर के साथ फिल्म रॉकस्टार में नजर आएंगी।

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निगार खान:

बिंदास ऎक्ट्रेस निगार खान का नाम भी इस लिस्ट में शामिल है। फिल्मों में सेक्सी सीन के अलावा उत्तेजक फोटोशूट से लेकर अपने कप़डे गिराने की खास अदाओं को लेकर खूब चर्चा में रही हैं निगार।

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मुग्धा गोडसे:

फिल्म फैशन में एंट्री करने के वाली हॉट और सेक्सी अदाकारा गुग्धा अपने फोटोशूट में ऎसे शॉट्स के बल पर वह दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए जगह बनाने का दम रखती हैं।

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नंदना सेन

फिल्म रंग रसिया में नंदना सेन ने काफी बोल्ड और सेक्सी सीन दिए हैं। नंदना इस फिल्म में कॉन्ट्रोवर्शल टॉपलेस सीन देने के लिए खूब सुर्खियों में रही हैं।

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बॉलिवुड की यह बंगाली बाला रिया सेन ने भले फिल्मों में अपनी कोई खास पहचान न बना पाई हो, लेकिन अपने विवादास्पद एमएमएस को लेकर चर्चाओं में टॉप पर रही हैं रिया।

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राजेश कुमार भगताणी
पिछले दो वर्षो से बॉलीवुड में विद्या बालन एक समर्थ अभिनेत्री के रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुई हैं। इन दो वर्षो में उन्होंने बॉलीवुड को अपने अभिनय से सजी चार ऎसी फिल्में दी हैं जिनको बॉलीवुड चाहकर भी कभी नहीं भुला सकता। जब कभी बॉलीवुड के सितारों का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें विद्या बालन को इन फिल्मों के लिए जरूर याद किया जाएगा, अगर ऎसा नहीं होता है तो वह अधूरा इतिहास कहलाएगा। इन दो वर्षो में विद्या बालन ने “पा”, “इश्किया”, “नो वल किल्ड जेसिका” और “डर्टी पिक्चर” जैसी बेहतरीन और नायिका प्रधान फिल्में बॉलीवुड को दी हैं। वैसे माना जाता है कि देश के दर्शक ऎसी फिल्में अधिक पसन्द नहीं करते हैं, जो नायिका प्रधान होती हैं लेकिन इन चार फिल्मों के जरिए विद्या बालन ने बॉलीवुड में बने इस मिथक को तोडने में कामयाबी प्राप्त की है। बॉलीवुड में नायिकाओं का सफर बेहद सीमित माना जाता है। दर्शकों की नजर में चढने वाली अभिनेत्री ज्यादा से ज्यादा 8 या 10 साल के लिए आती है। इस दौरान उसे शुरूआती सफलता के बाद लगातार असफलता का मुंह देखना पडता है और फिर जाकर उसे कोई ऎसा किरदार मिलता है जिससे उसे प्रसिद्धि मिलती है। इसके बलबूते पर वह अपने करियर के कुछ और साल गुजार लेती है। वर्तमान में बॉलीवुड नायिकाओं में विद्या बालन ऎसा नाम है जिसने अपनी पहली हिन्दी फिल्म परिणीता से दर्शकों में ऎसी छवि बनाई है जिसमें भारतीयता की झलक नजर आई। विधु विनोद चोपडा की प्रदीप सरकार द्वारा निर्देशित परिणीता बंगाल के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र के उपन्यास परिणीता पर आधारित थी। इस उपन्यास पर पहले भी दो फिल्में बन चुकी थीं। बरसों पूर्व जितेन्द्र और सुलक्षणा पंडित को लेकर बनी परिणीता को दर्शकों ने काफी पसन्द किया था। अरसे बाद फिर से परदे पर उतरी परिणीता को इस बार भी दर्शकों ने अपनी आंखों में बसाया। इन दिनों विद्या बालन मीडिया के हर रूप में चर्चा पा रही हैं। इस चर्चा की वजह बनी है एकता कपूर द्वारा निर्मित और मिलन लूथरिया द्वारा निर्देशित डर्टी पिक्चर। दक्षिण भारत की सेक्स बम के नाम से मशहूर रही अभिनेत्री सिल्क स्मिता के जीवन पर आधारित यह फिल्म अपनी घोषणा के वक्त से ही चर्चा में है। जहां इस फिल्म को एकता कपूर के कारण चर्चा मिल रही है वहीं इस फिल्म में विद्या बालन के कारण भी चर्चा मिल रही है। इस फिल्म के लिए विद्या बालन ने अपने कूल्हों की सर्जरी तक करवाने का विचार किया था, लेकिन फिर उन्होंने नकली पैड्स के जरिए अपने कूल्हों की साइज को विस्तार दिया है। इस किरदार को जीवंत बनाने के लिए विद्या कोई कसर बाकी नहीं रखी, नतीजा सबके सामने है। परिणीता के रूप में आई विद्या बालन दर्शकों की आंखों में मोनालिसा की तरह बस गई। इस फिल्म के बाद विद्या की चर्चा तो होती थी लेकिन कोई अच्छा किरदार उनको नहीं मिल पा रहा था। उनकी अभिनय क्षमता को फिर से विधु विनोद चोपडा ने एक नए निर्देशक राजकुमार हिरानी के हाथों संवारा लगे रहो मुन्नाभाई में। यह राजकुमार हिरानी की मुन्नाभाई एमबीबीएस का अगला भाग या सी`ल नहीं था बल्कि हिरानी ने मुन्नाभाई को ब्रांड बनाकर पेश किया था। 2006 में प्रदर्शित हुई यह फिल्म उस साल की सर्वाधिक हिट फिल्मों में दूसरे नम्बर पर थी। 2007 जनवरी में आई मणिरत्नम की गुरू ने विद्या बालन को नई पहचान दी। इस फिल्म में उन्होंने विकलांग युवती की भूमिका को जिस सहजता और विश्वसनीयता के साथ परदे पर उतारा वह तारीफे काबिल था। छह साल के करियर में विद्या बालन के लिए 2007 विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है। इस वर्ष उनकी जहां गुरू में तारीफ हुई वहीं उनकी फिल्म हे बेबी ने भी बाक्स ऑफिस पर अच्छा व्यवसाय किया। हालांकि इस फिल्म में उनके पहनावे को लेकर बॉलीवुड की अन्य नायिकाओं के मध्य खासी चर्चा रही। कहा जा रहा था कि विद्या बालन में डे्रस सेंस नहीं है। यह वास्तविकता भी थी। हे बेबी में वे पश्चिमी परिधान में बेतरतीब नजर आई थीं। इसके बाद इसी साल आई प्रियदर्शन की भूलभुलैया ने विद्या बालन के अभिनय को नये अंदाज के साथ परदे पर उतारा। पूर्ण रूप से भारतीय मूरत में आई इस नायिका ने फिल्म के कई दृश्यों में शरीर में समाई आत्मा के दृश्यों में अपने चेहरे पर भावाभिव्यक्ति से दर्शकों की वाहवाही लूटी। हालांकि इसी वर्ष निखिल अडवाणी के निर्देशन में आई सलाम-ए-इश्क में जॉन अब्राहम के साथ उनकी कैमिस्ट्री रील लाइफ से निकलकर कुछ समय के लिए रीयल लाइफ में चली गई थी। जॉन अब्राहम के साथ विद्या के सम्बन्धों ने बिपाशा बसु की नींद उडा दी थी। कुछ समय तक चला यह अफेयर बिना किसी शोर शराबे ब्रेकअप में बदला। बीता साल 2010 विद्या बालन के करियर में स्वर्ण युग की तरह रहा है। इस वर्ष उनकी दो फिल्में परदे पर आई और इन दोनों ही फिल्मों में अपने सहज अभिनय से उन्होंने दर्शकों के साथ समालोचकों तक को चौंका दिया। फिल्म ट्रेड के जो लोग विद्या के लिए कहते थे कि वह सीधी सादी गांव की बहनजी जैसी लगती है, इश्किया में उनकी भूमिका को देख न केवल चौंके बल्कि बॉलीवुड को विद्या द्वारा दी गई नई सैक्स इमेज को लेकर बडे-बडे बयान दिए। विशाल भारद्वाज निर्मित और अभिषेक चौबे निर्देशित इश्किया में उन्होंने अपनी काली कजरारी आंखों, लम्बोतर चेहरे और सुतवां नाक के साथ जो भाव दिए वे तारीफे काबिल थे। पूरी फिल्म में सीधे पल्लू की साडी पहनकर भी उन्होंने जिस अंदाज में सेक्स को प्रदर्शित किया वह उन अभिनेत्रियों के लिए एक सबक था जो बदन दिखाने को ही अपनी सेक्स छवि मानती हैं। विशाल भारद्वाज इश्किया का सीक्वल बनाने जा रहे हैं लेकिन अफसोस इसमें उन्होंने विद्या बालन को कोई किरदार नहीं दिया है। एक तरफ जहां इश्किया से उनकी छवि सेक्सी महिला की बनी वहीं अमिताभ बच्चन अभिनीत और निर्मित पा में उन्होंने कत्तüव्यनिष्ठ डाक्टर मां की भूमिका को जिस संजीदा तरीके से निभाया वह अपने आप में एक मिसाल बना। एक मां, जो यह जानती है कि उसका बच्चा कभी भी इस दुनिया को अलविदा कह सकता है, के बाद भी अपनी कत्तüव्यपरायणता में कोताही नहीं बरतती है। इस फिल्म के लिए जहां अमिताभ बच्चन को पुरस्कार मिले वहीं विद्या बालन ने भी अनेक पुरस्कार प्राप्त किए। एकता कपूर ने विद्या बालन को इश्किया में देखने के बाद ही अपनी फिल्म डर्टी पिक्चर की नायिका के लिए चुना। उन्हें पूरा विश्वास है कि नायिका की शक्ल में जिस तरह का ग्लैमर उन्हें परदे पर दर्शाना है उसके लिए विद्या बालन से बढकर कोई नहीं है। “द डर्टी पिक्चर” प्रदर्शित हो गई। इस फिल्म को देखने के बाद एक ही सवाल मन में उभर कर आ रहा है कि क्या वास्तव में विद्या बालन ने सिल्क स्मिता को परदे पर उतारने में कामयाबी प्राप्त की है। इसका जवाब हमें हमारे अंत:मन से “हाँ” में मिलता है। हमने अपनी उम्र के हिसाब से बॉलीवुड की कई नायिकाओं की फिल्मों को देखा और सिल्क स्मिता की कुछ हिन्दी और कुछ दक्षिण भारतीय फिल्मों को देखा है। उसी आधार पर यह कहने में कोई अतिश्योक्ति महसूस नहीं हो रही है कि विद्या बालन ने सिल्क स्मिता के किरदार में कमाल किया है। उनकी इस किरदार में किए गए अभिनय के लिए जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। अपने शारीरिक डीलढौल के अलावा उन्होंने अपने पहनावे, अपनी भाव भंगिमाओं और अदाओं के जरिए जो कुछ परदे पर पेश किया है उसे शब्दों में बया करना मुश्किल है। इसे तो फिल्म देखकर ही समझा और महसूस किया जा सकता है। विद्या बालन ने “डर्टी पिक्चर” में किए अपने अभिनय से बॉलीवुड की उन अभिनेत्रियों के सामने चुनौती पेश की है जो अपने अर्धनग्न जिस्म की नुमाइश को ही अभिनय मान कर चल रही है। विद्या बालन ने “डर्टी पिक्चर” में जो कुछ किया है उसके लिए इस वर्ष के समस्त पुरस्कार उनकी झोली में जाए इसमें कोई शक नजर नहीं आता है। निर्देशक के साथ-साथ कहानीकार ने सिल्क के बहाने द डर्टी पिक्चर के जरिए फिल्म इंडस्ट्री के एक दौर के पाखंड को उजागर किया है।

इसके साथ ही फिल्म डांसिंग गर्ल में मौजूद औरत के दर्द को भी जाहिर करती है। सिल्क अपनी कामयाबी के यथार्थ को भी समझती है। उसके अंदर कोई अपराध बोध नहीं है, लेकिन जब मां उसके मुंह पर दरवाजा बंद कर देती है और उसका प्रेमी स्टार अचानक बीवी के आ जाने पर उसे बाथरूम में भेज देता है तो उसे अपने दोयम दर्जे का भी एहसास होता है। सिल्क की कहानी को बेस बनाकर एकता कपूर ने द डर्टी पिक्चर बनाई। साउथ में सिल्क को डर्टी फिल्मों की हीरोइन कहा जाता था। सिल्क की बिखरी और रहस्यमयी जिंदगी को बेस बनाकर फिल्म बनाना आसान काम नहीं था। इसीलिए कथा पटकथाकार रजत अरोडा ने कहानी की शुरूआत और इंटरवल के बाद की कहानी में कुछ फिल्मी बदलाव भी किए हैं। लेकिन इन छोटे-मोटे बदलावों के बावजूद फिल्म स्टार्ट टू लास्ट सिल्क को बेस बनाकर बनाई गई फिल्म लगती है। मिलन लूथरिया ने द डर्टी पिक्चर में विद्या बालन की अद्वितीय प्रतिभा का समुचित उपयोग किया है। हिंदी फिल्मों में हाल-फिलहाल में ऎसी साहसी अभिनेत्री नहीं दिखी है। विद्या बालन ने सिल्क के किरदार में खुद को ढाल दिया है। इन दिनों हर एक्टर कैरेक्टर में ढलने के लिए अपने रंग रूप में परिवर्तन लाते हैं, लेकिन वह ज्यादातर कास्मेटिक चेंज ही होता है। विद्या ने भद्दी दिखने की हद तक खुद को बदला है। यह उनकी अभिनय प्रतिभा और निर्देशक की दृश्य संरचना की खूबी है कि अंग प्रदर्शन और कामुक भाव मुद्राओं के बावजूद विद्या अश्लील नहीं लगतीं। इस फिल्म के पहले आइटम गीत में दर्शकों को रिझाने के लिए प्रदर्शित विद्या बालन की उत्तेजक मुद्राएं भी स्वाभाविक लगती हैं।

विद्या की संवेदनशीलता और संलग्नता से अश्लील उद्देश्य से रचे गए दृश्यों में भी स्त्री देह का सौंदर्य दिखता है। ऎसा लगता है कि किसी शिल्पकार ने बडे यत्न से कोई सौंदर्य प्रतिभा गढी हो। दरअसल, निर्देशक की मंशा देह दर्शन और प्रदर्शन की नहीं है। वह उस देह में मौजूद औरत को उन संदर्भो के साथ चित्रित करने में लीन है। फिल्म के दौरान विद्या बालन याद नहीं रहती। हमारे सामने सिल्क रहती है, जो दर्शकों का मनोरंजन करने आई है। विद्या ने इस फिल्म में अभिनय का मापदंड ऊंचा कर दिया है। द डर्टी पिक्चर निर्देशक-लेखक के संयुक्त प्रयास की सम्मलित सफलता है। मिलन लुथरिया और रजत अरो़डा की परस्पर समझदारी और सहयोग ने फिल्म को मजबूत आधार दिया है। फिल्म के संवाद बहुत कुछ कह जाते हैं। द डर्टी पिक्चर के संवाद अलग मायने में द्विअर्थी हैं। इसका दूसरा अर्थ मारक है और सीधे चोट करता है और झूठ पाखंड की कलई खोल देता है। उन संवादों को विद्या बालन ने सार्थक ढंग से उचित ठहराव, जोर और भाव के साथ अभिव्यक्त किया है। समकालीन अभिनेत्रियों को विद्या से संवाद अदायगी का सबक लेना चाहिए।

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दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर इन दिनों कार का एक विज्ञापन दर्शकों को आकçष्ाüत करने में सफल हो रहा है। वैसे भी विज्ञापन की दुनिया में बहुत कम ऎसे विज्ञापन होते हैं जिनको दर्शक पसन्द करते हैं। अपने समय में कैडबरी का एक विज्ञापन दर्शकों को बहुत पसन्द आया था। ऎसा नहीं है कि विज्ञापन का असर श्रोताओं और दर्शकों पर नहीं पडता, पडता है लेकिन उन विज्ञापनों का विशेष रूप से जो दर्शकों को गहराई तक प्रभावित करते हैं। खैर हम बात कर रहे थे कार के विज्ञापन की। एक कार के विज्ञापन में रणबीर कपूर को “चला जाता हूँ किसी की धुन में . . .” गाते हुए देखना उस दौर की याद दिला देता है जब अनेक फिल्मों में हीरो या हीरोइन कार में गीत गाते चलते थे। कार नहीं तो मोटरसाइकल या फिर साइकिल या फिर तांगा, बैलगाडी, ट्रक, रेल और अन्त में नाव ही सही…। हिन्दी फिल्मों के स्वर्णिम दौर के अनेक यादगार गाने वाहन पर सवार हीरो/हीरोइन पर फिल्माए गए हैं। आज के दौर में इस तरह के गीतों का अभाव महसूस होता है। नब्बे के दशक के बाद से बॉलीवुड में गीतों के फिल्मांकन के तौर-तरीके में जो बदलाव आया, उसके बाद से ऎसे गीतों की गुंजाइश कम हो गई। शायद इसका एक कारण यह भी है कि उस जमाने में कार तो कार, बाइक भी चुनिंदा घरों में ही पाई जाती थी। ऎसे में पर्दे पर किसी को कार या बाइक चलाते हुए गाना गाते दिखाना सिनेमाई फंतासी जगत को गढने में योगदान करता था। आज जब छोटे शहरों और कस्बों में मध्यमवर्गीय घरों के बाहर भी दोपहिया और चारपहिया वाहन खडे होना आम बात हो गई है, तब रूपहले पर्दे पर ऎसे “वाहन गीत” उस तरह आकर्षण का केंद्र नहीं बन सकते जैसे पहले हुआ करते थे। सडकों पर सरपट भागते वाहन पर फिल्माए गए गीत अक्सर जिंदगी को लेकर फलसफे सुनाया करते थे। याद कीजिए नलिनी जयवंत के साथ कार में सवार देव आनंद को “जीवन के सफर में राही…” (मुनीमजी) गाते हुए। वही देव आनंद बरसों बाद कार दौडाते हुए ही जाहिदा को चूडियों का सेट भेंट करते हुए फरमाते हैं “चूडी नहीं ये मेरा दिल है…” (गैम्बलर)। “मेरे जीवन साथी” में राजेश खन्ना अपनी भावी जीवन संगिनी के ख्यालों में डूबे “चला जाता हूँ…” गाते चलते हैं, तो “कश्मीर की कली” में शम्मी कपूर “किसी न किसी से कभी न कभी…” गाते हुए अपनी नियति को स्वीकार करते हैं कि दिल तो उनको लगाना ही पडेगा। शम्मी कपूर का जिक्र चला है तो याद आता है उन पर फिल्माया गया फिल्म “इन इवनिंग इन पेरिस” का गीत जिसमें वे हेलीकॉप्टर पर सवार हैं और अपनी नायिका शर्मिला टैगोर जो समुद्र में पानी पर स्केटिंग करती हुई दिखायी दे रही हैं। गीत के बोल बडे प्यारे हैं “ओ जानेमन दिलारा जरा एक नजर इधर भी, आसमान से आया फरिश्ता प्यार का सबक सिखलाने दिल में है तस्वीर यार की आया हूं वो दिखलाने कहो प्यार है हम से, ओ जाना कहो प्यार है हमसे” और बॉलीवुड के प्रथम हीमैन धर्मेन्द्र पर फिल्माया गया प्रमोद चक्रवर्ती की फिल्म “जुगनू” के गीत को कोई नहीं भूल सकता है। नायक-नायिका दोनों अलग-अलग हैलीकॉप्टर पर हैं। गीत के बोल हैं “भेज दे चाहे जेल में प्यार के इस खेल में, तेरा पीछा ना मैं छोडूंगा सोणिये” मुंबई की बारिश में भीगी सडकों पर दौडती गाडी में गाया गया “तुम जो मिल गए हो…” (हँसते जख्म, चेतन आनन्द) जबरदस्त रोमांटिक माहौल रचता है। वहीं “बाबू समझो इशारे…” (चलती का नाम गाडी) गाते हुए अपनी विंटेज कार में शान की सवारी करते गांगुली बंधु कॉमेडी की रचना करते हैं। “ब्रहमचारी” में शम्मी कपूर बच्चों की टोली को “चक्के में चक्का चक्के में गाडी..” की सवारी कराते हैं, तो “फूल खिले हैं गुलशन गुलशन” में ऋषि कपूर अपनी मित्र मंडली के साथ “मन्नूभाई मोटर चली…” गाते हुए चौपाटी पर भेलपूरी खाने निकलते हैं। जीप में भले ही कार जैसा ग्लैमर नहीं लेकिन फिल्मी गानों में उसने भी स्थान पाया है। कश्मीर की मनोरम सडक पर खुली जीप में सवार विश्वजीत तो “पुकारता चला हूँ मैं…” (मेरे सनम) गाकर रोमांटिक माहौल रचते हैं। जीप की ही सवारी करते शशि कपूर नीतू सिंह से पूछते हैं, “कह दूँ तुम्हें या चुप रहूँ…” (दीवार)। फिर हम कैसे भुला दें कि खुली जीप पर सवार होकर दार्जिलिंग जाते राजेश खन्ना ने ही “मेरे सपनों की रानी…” (आराधना) गाकर शर्मिला टैगोर सहित पूरे देश का दिल जीता था। खुली जीप में जुबली कुमार राजेन्द्र कुमार पर फिल्माया गया और रफी की आवाज में गाया गया गीत “कौन है जो सपनों में आया, कौन है जो दिल में समाया, लो झुक गया आसमां भी इश्क मेरा रंग लाया” (झुक गया आसमान) को भुला पाना बेहद मुश्किल भरा काम है। हीरो की मर्दानगी और जाँबाजी दिखाने के लिए उसे मोटरसाइकल चलाते और साथ ही गाना गाते हुए दिखाने की भी लंबी परंपरा रही है। “अंदाज” में राजेश खन्ना का छोटा सा किरदार स्थापित करने में बाइक की सवारी और उस पर किशोर कुमार की आवाज में “जिंदगी इक सफर है सुहाना…” ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। “मुकद्दर का सिकंदर” में अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया शीर्षक गीत “रोते हुए आते हैं सब…” आज भी युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। वहीं साइडकार वाली बाइक पर सवार जय-वीरू की जोडी “ये दोस्ती …” (शोले) गाते हुए ही अपनी मित्रता की खातिर किसी भी हद तक जाने का ऎलान करती है। मोटर साइकिल पर फिल्मों में कई गीतों को फिल्माया गया है। यश चोपडा ने अपनी फिल्म “काला पत्थर” में इंजीनियर शशि कपूर पर किशोर कुमार की आवाज में “इक रास्ता है जिंदगी…” फिल्माया वहीं अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना पर मनमोहन देसाई ने “जाते हो जाने जाना प्यार का सलाम लेते जाना” गीत के जरिए युवाओं को बादक की तरफ आकर्षित किया। फिल्मों में जहाँ मोटर साइकिल, कार और जीप पर गीत फिल्माए गए हैं वहीं गांवों की सवारी तांगा, बैलगाडी, रिक्शा और आम आदमी की सुपर सवारी साइकिल पर भी गीतों का फिल्मांकन किया गया है। बैलगाडी का जिक्र करने पर दो फिल्मों का जिक्र करना सर्वाधिक उपयुक्त होगा। अपने समय के दो कालजयी गीत इन पर फिल्माए गए हैं। पहला फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास पर बनी फिल्म “तीसरी कसम” जिसमें राजकपूर और वहीदा रहमान की जोडी थी। इस दोनों पर गीतकार और निर्माता शैलेन्द्र ने चार गीत फिल्माये। यह चारों गीत आज भी श्रोताओं के जेहन में चलचित्र की भांति चलते हैं। “सजनवा बैरी हो गए हमार”, “दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई”, “सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना” और “चलत मुसाफिर” ऎसे गीत हैं जिसे आज भी दर्शक सुनना और गुनगुनाना पसन्द करते हैं। 1966 में बासु भट्टाचार्य के निर्देशन में बनी इस फिल्म के संगीत ने अपने समय में रिकॉर्ड सफलता प्राप्त की इसके बावजूद बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म असफल सिद्ध हो गई। ऎसी ही एक फिल्म आई थी संजीव कुमार की “अनोखी रात”। इस फिल्म में संजीव कुमार पर बैलगाडी पर मुकेश की आवाज में “ओह रे ताल मिले नदी के जल में नदी मिले सागर में, सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना” ऎसा गीत है जो भुलाए नहीं भूल पाते हैं। अपने समय में तांगे पर भी कई गीतों को फिल्माया गया है। यहाँ जिक्र करना चाहेंगे विश्व सिनेमा में जगह बनाने वाली “शोले” का जिसमें हेमामालिनी तांगा चला रही हैं और धर्मेन्द्र साइकिल चलाते हुए गीत “कोई हसीना जब रूठ जाती है तो है तो और भी हसीन हो जाती है” के जरिए प्रेमिका को मनाने का प्रयास कर रहे हैं। साइकिल पर ही गोविन्दा और जूही चावला के युवा प्रेम को दर्शाता गीत “चाँदी की साइकिल, सोने की सीट आओ चले डार्लिग चलें डबल सीट” गाते अपने प्रेम का इजहार कर रहे हैं। पुरानी फिल्मों में ऎसे कई गाने हैं जो साइकिल पर फिल्माए गए हैं। इनमें याद आता है “पेइंग गेस्ट” में देव आनंद का गीत जो साइकिल पर सवार होकर राह चलती नूतन से कहते हैं “माना जनाब ने पुकारा नहीं…” और वहीं दूसरी ओर वे साइकिल पर मुमताज को आगे बैठाकर “तेरे मेरे सपने” में “हे मैंने कसम ली…” गाते हुए कभी जुदा न होने की कसम खाते हैं। देव आनन्द ने ही फिल्म “बात एक रात की” में अकेले साइकिल पर चलते हुए अपनी एकांकी जिन्दगी को कुछ इस तरह से बयां किया “अकेला हूं मैं इस दुनिया के लिए कोई साथी है तो मेरा साया”। “खुद्दार” में संजीव कुमार साइकल की सवारी करते हुए ही अपने छोटे भाइयों को समझाते हैं : “ऊँचे-नीचे रास्ते और मंजिल तेरी दूर…”। पचास-साठ के दशक में पिकनिक मनाने जा रही दोस्तों/सहेलियों की टोली तो अक्सर साइकिलों के कारवाँ पर ही गाते हुए चलती थी। जैसे सायरा बानो “पडोसन” में “मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली मुझे रोको ना कोई मैं चली मैं चली…”। तांगे पर फिल्माए गए गीतों में जब तक दिलीप कुमार वैजयन्ती माला की “नया दौर” का जिक्र न हो तो बात अधूरी लगती है। इस फिल्म में तांगा चलाते हुए दिलीप कुमार को उनके पास बैठी वैजयन्ती माला “मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार” गाते हुए अपनी जिन्दगी की मनोकामना पूर्ण होने का अहसास दिलाती हैं। ऎसा ही एक गीत मनोज कुमार व शर्मिला टैगोर पर “सावन की घटा” में फिल्माया गया था। इस गीत में शर्मिला मनोज कुमार से प्रेम की गाडी को हौले हौले चलाने की गुजारिश करती हैं। गीत के बोल हैं “जरा हौले-हौले चलो मोरे साजना हम भी पीछे हैं तुम्हारे”। तांगे की सवारी करते हुए गुलजार ने परिचय में बेहतरीन गीत फिल्माया। इस गीत के बोल गुलजार ने ही लिखे थे। गीत के बोल नायक की जिन्दगी के फलसफे को बयां करते हैं जिसमें नायक कहता है “मुसाफिर हूं यारों न घर है न ठिकाना मुझे चलते जाना है”। यह पूरा गीत गुलजार ने तांगे पर ही फिल्माया था। गीतों के फिल्मांकन में ट्रकों का भी इस्तेमाल किया गया है। हालांकि फिल्मों में ट्रकों को ज्यादा हादसे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके बावजूद इस साधन पर कुछ ऎसे गीत हैं जो आज भी याद आते हैं। उदाहरण के तौर पर देव आनन्द की फिल्म “नौ दो ग्यारह” के गीत “हम हैं राही प्यार के…” और शम्मी कपूर, शर्मिला टैगोर पर फिल्म “कश्मीर के कली” “सुबहान अल्लाह हसीं चेहरा…” और जितेन्द्र शर्मिला टैगोर पर फिल्माया गया फिल्म “मेरे हमसफर” का शीर्षक गीत “किसी राह पे किसी मोड पर कहीं चल न देना तू छोड कर मेरे हमसफर” जिन्दगी की भागती रफ्तार के साथ युवाओं के प्रेम में डूबे होने का बखूबी चित्रण करता है। फिल्मों में गीत फिल्मांकन में ट्रेनों का योगदान भी उल्लेखनीय है। कई ऎसे रोमांटिक गीत हैं जो चलती हुई रेलगाडी में फिल्माये गए हैं या फिर उसे गीत का महžवपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। जैसे शक्ति सामंत की राजेश खन्ना अभिनीत “आराधना” का “मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू” जिसमें एक तरफ दार्जिलिंग की हसीन वादियों में सडक के साथ-साथ रेल पटरी पर दौडती ट्रेन से देखती हुई नायिका को नायक रिझाने का प्रयास कर रहा है। इसी तरह देव आनन्द की फिल्म “जब प्यार किसी से होता है” में नायक कार की छत पर बैठा हुआ कश्मीर की सडक किनारे स्थित पटरी पर तेज गति से चलती गाडी में बैठी नायिका (आशा पारिख) से “जिया हो जिया हो कुछ बोल दो” कहते हुए अपने प्रेम का इजहार करता हुआ नजर आता है, विशेष उल्लेखनीय हैं। वाहनों पर गीतों के जिक्र में अगर पानी में चलने वाली नाव का जिक्र न किया जाए तो आलेख में अधूरापन लगता है। भारतीय हिन्दी फिल्मों में पानी में चलती नाव पर कुछ ऎसे गीत फिल्माए गए हैं जिन्होंने अपने समय में श्रोताओं को खासा प्रभावित किया है। शक्ति सामंत की फिल्म “कटी पतंग” में नाव में बैठी नायिका को देखते हुए नायक कहता है, “जिस गली में तेरा घर न हो बालमा उस गली में पांव रखना नहीं” इन बोलों से नायक कहना चाहता है कि जहां पर तू नहीं होगी वहां मैं जाकर क्या करूंगा। असित सेन के निर्देशन में बनी “सफर” का गीत जिसके बोलो से वे नायक को जिन्दगी का फलसफा बयां करते हुए कहते हैं, “नदिया चले, चले रे धारा चंदा चले चले रे तारा, तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा” को भुलाए नहीं भुला जा सकता। हाल के वर्षो की बात की जाए तो “दिल चाहता है” से लेकर “जिंदगी ना मिलेगी दोबारा” तक कुछेक फिल्मों में कार या किसी अन्य वाहन की सवारी करते कलाकारों के साथ पाश्र्व में गीत जरूर बजता सुनाई देता है लेकिन एक तो ऎसे गाने कम ही हैं, दूसरे इन्हें फिल्माने का अंदाज भी अब बदल गया है। सिनेमाई परदे से गायब हुए इन गीतों को एक बार फिर से देखने की आस मन में जगने लगी है। इसका कारण यह है कि आजकल बॉलीवुड में सत्तर और अस्सी के दशक की फिल्मों को रीमेक या सीक्वल के तौर पर बनाया जा रहा है। जब आधार पुराना होगा तो निश्चित है उसका ढाँचा भी पुराना ही होगा। हो सकता है निर्देशक उस दौर को एक बार फिर से परदे पर उतारने का साहस करें और दर्शकों को यह बताने में सफल हो सकें कि किस तरह पुरानी फिल्मों में गीतों का फिल्मांकन किया जाता था। सीक्वल और रीमेक को देखते हुए संभावना बनती है कि शायद फिल्मी गीतों में कार, बाइक आदि भी पुन: पहले जैसा स्थान पाएँ…।

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