दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर इन दिनों कार का एक विज्ञापन दर्शकों को आकçष्ाüत करने में सफल हो रहा है। वैसे भी विज्ञापन की दुनिया में बहुत कम ऎसे विज्ञापन होते हैं जिनको दर्शक पसन्द करते हैं। अपने समय में कैडबरी का एक विज्ञापन दर्शकों को बहुत पसन्द आया था। ऎसा नहीं है कि विज्ञापन का असर श्रोताओं और दर्शकों पर नहीं पडता, पडता है लेकिन उन विज्ञापनों का विशेष रूप से जो दर्शकों को गहराई तक प्रभावित करते हैं। खैर हम बात कर रहे थे कार के विज्ञापन की। एक कार के विज्ञापन में रणबीर कपूर को “चला जाता हूँ किसी की धुन में . . .” गाते हुए देखना उस दौर की याद दिला देता है जब अनेक फिल्मों में हीरो या हीरोइन कार में गीत गाते चलते थे। कार नहीं तो मोटरसाइकल या फिर साइकिल या फिर तांगा, बैलगाडी, ट्रक, रेल और अन्त में नाव ही सही…। हिन्दी फिल्मों के स्वर्णिम दौर के अनेक यादगार गाने वाहन पर सवार हीरो/हीरोइन पर फिल्माए गए हैं। आज के दौर में इस तरह के गीतों का अभाव महसूस होता है।
नब्बे के दशक के बाद से बॉलीवुड में गीतों के फिल्मांकन के तौर-तरीके में जो बदलाव आया, उसके बाद से ऎसे गीतों की गुंजाइश कम हो गई। शायद इसका एक कारण यह भी है कि उस जमाने में कार तो कार, बाइक भी चुनिंदा घरों में ही पाई जाती थी। ऎसे में पर्दे पर किसी को कार या बाइक चलाते हुए गाना गाते दिखाना सिनेमाई फंतासी जगत को गढने में योगदान करता था। आज जब छोटे शहरों और कस्बों में मध्यमवर्गीय घरों के बाहर भी दोपहिया और चारपहिया वाहन खडे होना आम बात हो गई है, तब रूपहले पर्दे पर ऎसे “वाहन गीत” उस तरह आकर्षण का केंद्र नहीं बन सकते जैसे पहले हुआ करते थे। सडकों पर सरपट भागते वाहन पर फिल्माए गए गीत अक्सर जिंदगी को लेकर फलसफे सुनाया करते थे। याद कीजिए नलिनी जयवंत के साथ कार में सवार देव आनंद को “जीवन के सफर में राही…” (मुनीमजी) गाते हुए। वही देव आनंद बरसों बाद कार दौडाते हुए ही जाहिदा को चूडियों का सेट भेंट करते हुए फरमाते हैं “चूडी नहीं ये मेरा दिल है…” (गैम्बलर)।
“मेरे जीवन साथी” में राजेश खन्ना अपनी भावी जीवन संगिनी के ख्यालों में डूबे “चला जाता हूँ…” गाते चलते हैं, तो “कश्मीर की कली” में शम्मी कपूर “किसी न किसी से कभी न कभी…” गाते हुए अपनी नियति को स्वीकार करते हैं कि दिल तो उनको लगाना ही पडेगा। शम्मी कपूर का जिक्र चला है तो याद आता है उन पर फिल्माया गया फिल्म “इन इवनिंग इन पेरिस” का गीत जिसमें वे हेलीकॉप्टर पर सवार हैं और अपनी नायिका शर्मिला टैगोर जो समुद्र में पानी पर स्केटिंग करती हुई दिखायी दे रही हैं। गीत के बोल बडे प्यारे हैं “ओ जानेमन दिलारा जरा एक नजर इधर भी, आसमान से आया फरिश्ता प्यार का सबक सिखलाने दिल में है तस्वीर यार की आया हूं वो दिखलाने कहो प्यार है हम से, ओ जाना कहो प्यार है हमसे” और बॉलीवुड के प्रथम हीमैन धर्मेन्द्र पर फिल्माया गया प्रमोद चक्रवर्ती की फिल्म “जुगनू” के गीत को कोई नहीं भूल सकता है। नायक-नायिका दोनों अलग-अलग हैलीकॉप्टर पर हैं। गीत के बोल हैं “भेज दे चाहे जेल में प्यार के इस खेल में, तेरा पीछा ना मैं छोडूंगा सोणिये” मुंबई की बारिश में भीगी सडकों पर दौडती गाडी में गाया गया “तुम जो मिल गए हो…” (हँसते जख्म, चेतन आनन्द) जबरदस्त रोमांटिक माहौल रचता है। वहीं “बाबू समझो इशारे…” (चलती का नाम गाडी) गाते हुए अपनी विंटेज कार में शान की सवारी करते गांगुली बंधु कॉमेडी की रचना करते हैं। “ब्रहमचारी” में शम्मी कपूर बच्चों की टोली को “चक्के में चक्का चक्के में गाडी..” की सवारी कराते हैं, तो “फूल खिले हैं गुलशन गुलशन” में ऋषि कपूर अपनी मित्र मंडली के साथ “मन्नूभाई मोटर चली…” गाते हुए चौपाटी पर भेलपूरी खाने निकलते हैं। जीप में भले ही कार जैसा ग्लैमर नहीं लेकिन फिल्मी गानों में उसने भी स्थान पाया है।
कश्मीर की मनोरम सडक पर खुली जीप में सवार विश्वजीत तो “पुकारता चला हूँ मैं…” (मेरे सनम) गाकर रोमांटिक माहौल रचते हैं। जीप की ही सवारी करते शशि कपूर नीतू सिंह से पूछते हैं, “कह दूँ तुम्हें या चुप रहूँ…” (दीवार)। फिर हम कैसे भुला दें कि खुली जीप पर सवार होकर दार्जिलिंग जाते राजेश खन्ना ने ही “मेरे सपनों की रानी…” (आराधना) गाकर शर्मिला टैगोर सहित पूरे देश का दिल जीता था। खुली जीप में जुबली कुमार राजेन्द्र कुमार पर फिल्माया गया और रफी की आवाज में गाया गया गीत “कौन है जो सपनों में आया, कौन है जो दिल में समाया, लो झुक गया आसमां भी इश्क मेरा रंग लाया” (झुक गया आसमान) को भुला पाना बेहद मुश्किल भरा काम है। हीरो की मर्दानगी और जाँबाजी दिखाने के लिए उसे मोटरसाइकल चलाते और साथ ही गाना गाते हुए दिखाने की भी लंबी परंपरा रही है। “अंदाज” में राजेश खन्ना का छोटा सा किरदार स्थापित करने में बाइक की सवारी और उस पर किशोर कुमार की आवाज में “जिंदगी इक सफर है सुहाना…” ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। “मुकद्दर का सिकंदर” में अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया शीर्षक गीत “रोते हुए आते हैं सब…” आज भी युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। वहीं साइडकार वाली बाइक पर सवार जय-वीरू की जोडी “ये दोस्ती …” (शोले) गाते हुए ही अपनी मित्रता की खातिर किसी भी हद तक जाने का ऎलान करती है। मोटर साइकिल पर फिल्मों में कई गीतों को फिल्माया गया है।
यश चोपडा ने अपनी फिल्म “काला पत्थर” में इंजीनियर शशि कपूर पर किशोर कुमार की आवाज में “इक रास्ता है जिंदगी…” फिल्माया वहीं अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना पर मनमोहन देसाई ने “जाते हो जाने जाना प्यार का सलाम लेते जाना” गीत के जरिए युवाओं को बादक की तरफ आकर्षित किया। फिल्मों में जहाँ मोटर साइकिल, कार और जीप पर गीत फिल्माए गए हैं वहीं गांवों की सवारी तांगा, बैलगाडी, रिक्शा और आम आदमी की सुपर सवारी साइकिल पर भी गीतों का फिल्मांकन किया गया है। बैलगाडी का जिक्र करने पर दो फिल्मों का जिक्र करना सर्वाधिक उपयुक्त होगा। अपने समय के दो कालजयी गीत इन पर फिल्माए गए हैं। पहला फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास पर बनी फिल्म “तीसरी कसम” जिसमें राजकपूर और वहीदा रहमान की जोडी थी। इस दोनों पर गीतकार और निर्माता शैलेन्द्र ने चार गीत फिल्माये। यह चारों गीत आज भी श्रोताओं के जेहन में चलचित्र की भांति चलते हैं। “सजनवा बैरी हो गए हमार”, “दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई”, “सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना” और “चलत मुसाफिर” ऎसे गीत हैं जिसे आज भी दर्शक सुनना और गुनगुनाना पसन्द करते हैं। 1966 में बासु भट्टाचार्य के निर्देशन में बनी इस फिल्म के संगीत ने अपने समय में रिकॉर्ड सफलता प्राप्त की इसके बावजूद बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म असफल सिद्ध हो गई। ऎसी ही एक फिल्म आई थी संजीव कुमार की “अनोखी रात”। इस फिल्म में संजीव कुमार पर बैलगाडी पर मुकेश की आवाज में “ओह रे ताल मिले नदी के जल में नदी मिले सागर में, सागर मिले कौन से जल में कोई जाने ना” ऎसा गीत है जो भुलाए नहीं भूल पाते हैं। अपने समय में तांगे पर भी कई गीतों को फिल्माया गया है।
यहाँ जिक्र करना चाहेंगे विश्व सिनेमा में जगह बनाने वाली “शोले” का जिसमें हेमामालिनी तांगा चला रही हैं और धर्मेन्द्र साइकिल चलाते हुए गीत “कोई हसीना जब रूठ जाती है तो है तो और भी हसीन हो जाती है” के जरिए प्रेमिका को मनाने का प्रयास कर रहे हैं। साइकिल पर ही गोविन्दा और जूही चावला के युवा प्रेम को दर्शाता गीत “चाँदी की साइकिल, सोने की सीट आओ चले डार्लिग चलें डबल सीट” गाते अपने प्रेम का इजहार कर रहे हैं। पुरानी फिल्मों में ऎसे कई गाने हैं जो साइकिल पर फिल्माए गए हैं। इनमें याद आता है “पेइंग गेस्ट” में देव आनंद का गीत जो साइकिल पर सवार होकर राह चलती नूतन से कहते हैं “माना जनाब ने पुकारा नहीं…” और वहीं दूसरी ओर वे साइकिल पर मुमताज को आगे बैठाकर “तेरे मेरे सपने” में “हे मैंने कसम ली…” गाते हुए कभी जुदा न होने की कसम खाते हैं। देव आनन्द ने ही फिल्म “बात एक रात की” में अकेले साइकिल पर चलते हुए अपनी एकांकी जिन्दगी को कुछ इस तरह से बयां किया “अकेला हूं मैं इस दुनिया के लिए कोई साथी है तो मेरा साया”। “खुद्दार” में संजीव कुमार साइकल की सवारी करते हुए ही अपने छोटे भाइयों को समझाते हैं : “ऊँचे-नीचे रास्ते और मंजिल तेरी दूर…”। पचास-साठ के दशक में पिकनिक मनाने जा रही दोस्तों/सहेलियों की टोली तो अक्सर साइकिलों के कारवाँ पर ही गाते हुए चलती थी। जैसे सायरा बानो “पडोसन” में “मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली मुझे रोको ना कोई मैं चली मैं चली…”। तांगे पर फिल्माए गए गीतों में जब तक दिलीप कुमार वैजयन्ती माला की “नया दौर” का जिक्र न हो तो बात अधूरी लगती है। इस फिल्म में तांगा चलाते हुए दिलीप कुमार को उनके पास बैठी वैजयन्ती माला “मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार” गाते हुए अपनी जिन्दगी की मनोकामना पूर्ण होने का अहसास दिलाती हैं। ऎसा ही एक गीत मनोज कुमार व शर्मिला टैगोर पर “सावन की घटा” में फिल्माया गया था। इस गीत में शर्मिला मनोज कुमार से प्रेम की गाडी को हौले हौले चलाने की गुजारिश करती हैं। गीत के बोल हैं “जरा हौले-हौले चलो मोरे साजना हम भी पीछे हैं तुम्हारे”। तांगे की सवारी करते हुए गुलजार ने परिचय में बेहतरीन गीत फिल्माया। इस गीत के बोल गुलजार ने ही लिखे थे। गीत के बोल नायक की जिन्दगी के फलसफे को बयां करते हैं जिसमें नायक कहता है “मुसाफिर हूं यारों न घर है न ठिकाना मुझे चलते जाना है”। यह पूरा गीत गुलजार ने तांगे पर ही फिल्माया था। गीतों के फिल्मांकन में ट्रकों का भी इस्तेमाल किया गया है। हालांकि फिल्मों में ट्रकों को ज्यादा हादसे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके बावजूद इस साधन पर कुछ ऎसे गीत हैं जो आज भी याद आते हैं।
उदाहरण के तौर पर देव आनन्द की फिल्म “नौ दो ग्यारह” के गीत “हम हैं राही प्यार के…” और शम्मी कपूर, शर्मिला टैगोर पर फिल्म “कश्मीर के कली” “सुबहान अल्लाह हसीं चेहरा…” और जितेन्द्र शर्मिला टैगोर पर फिल्माया गया फिल्म “मेरे हमसफर” का शीर्षक गीत “किसी राह पे किसी मोड पर कहीं चल न देना तू छोड कर मेरे हमसफर” जिन्दगी की भागती रफ्तार के साथ युवाओं के प्रेम में डूबे होने का बखूबी चित्रण करता है। फिल्मों में गीत फिल्मांकन में ट्रेनों का योगदान भी उल्लेखनीय है। कई ऎसे रोमांटिक गीत हैं जो चलती हुई रेलगाडी में फिल्माये गए हैं या फिर उसे गीत का महžवपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।
जैसे शक्ति सामंत की राजेश खन्ना अभिनीत “आराधना” का “मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू” जिसमें एक तरफ दार्जिलिंग की हसीन वादियों में सडक के साथ-साथ रेल पटरी पर दौडती ट्रेन से देखती हुई नायिका को नायक रिझाने का प्रयास कर रहा है। इसी तरह देव आनन्द की फिल्म “जब प्यार किसी से होता है” में नायक कार की छत पर बैठा हुआ कश्मीर की सडक किनारे स्थित पटरी पर तेज गति से चलती गाडी में बैठी नायिका (आशा पारिख) से “जिया हो जिया हो कुछ बोल दो” कहते हुए अपने प्रेम का इजहार करता हुआ नजर आता है, विशेष उल्लेखनीय हैं। वाहनों पर गीतों के जिक्र में अगर पानी में चलने वाली नाव का जिक्र न किया जाए तो आलेख में अधूरापन लगता है। भारतीय हिन्दी फिल्मों में पानी में चलती नाव पर कुछ ऎसे गीत फिल्माए गए हैं जिन्होंने अपने समय में श्रोताओं को खासा प्रभावित किया है। शक्ति सामंत की फिल्म “कटी पतंग” में नाव में बैठी नायिका को देखते हुए नायक कहता है, “जिस गली में तेरा घर न हो बालमा उस गली में पांव रखना नहीं” इन बोलों से नायक कहना चाहता है कि जहां पर तू नहीं होगी वहां मैं जाकर क्या करूंगा। असित सेन के निर्देशन में बनी “सफर” का गीत जिसके बोलो से वे नायक को जिन्दगी का फलसफा बयां करते हुए कहते हैं,
“नदिया चले, चले रे धारा चंदा चले चले रे तारा, तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा” को भुलाए नहीं भुला जा सकता। हाल के वर्षो की बात की जाए तो “दिल चाहता है” से लेकर “जिंदगी ना मिलेगी दोबारा” तक कुछेक फिल्मों में कार या किसी अन्य वाहन की सवारी करते कलाकारों के साथ पाश्र्व में गीत जरूर बजता सुनाई देता है लेकिन एक तो ऎसे गाने कम ही हैं, दूसरे इन्हें फिल्माने का अंदाज भी अब बदल गया है। सिनेमाई परदे से गायब हुए इन गीतों को एक बार फिर से देखने की आस मन में जगने लगी है। इसका कारण यह है कि आजकल बॉलीवुड में सत्तर और अस्सी के दशक की फिल्मों को रीमेक या सीक्वल के तौर पर बनाया जा रहा है। जब आधार पुराना होगा तो निश्चित है उसका ढाँचा भी पुराना ही होगा। हो सकता है निर्देशक उस दौर को एक बार फिर से परदे पर उतारने का साहस करें और दर्शकों को यह बताने में सफल हो सकें कि किस तरह पुरानी फिल्मों में गीतों का फिल्मांकन किया जाता था। सीक्वल और रीमेक को देखते हुए संभावना बनती है कि शायद फिल्मी गीतों में कार, बाइक आदि भी पुन: पहले जैसा स्थान पाएँ…।
खत्म हुआ गाडी, घोडों पर चढकर गाने का दौर
दिसम्बर 1, 2011 khaskhabar द्वारा