11 दिसंबर 2011 को दिलीप कुमार 89 वर्ष के हो गएं। उन्हें ट्रेजेडी किंग कहा जाता है क्योंकि ट्रेजेडी को उन्होंने बखूबी पर्दे पर पेश किया। उन्हें अभिनय सम्राट कहा जाता है क्योंकि ये माना जाता है कि हिंदी फिल्म में उनके जैसा बेजोड अभिनेता और कोई दूसरा नहीं हुआ है। दिलीप कुमार के अभिनय की नकल कई कलाकारों ने की, जिनमें मनोज कुमार, राजेन्द्र कुमार, अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरूख खान तक शामिल हैं। कई कलाकारों ने स्वीकारा की न चाहते हुए भी वे इस महान अभिनेता से प्रभावित हो गए। दिलीप साहब चेहरे के भावों के जरिये ही बिना संवाद के ही कई बातें बोल दिया करते हैं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चने भी मानते हैं कि उनके आदर्श दिलीप कुमार हैं।
जन्म के लिहाज से वह उनसे 20 साल बडे हैं लेकिन पेशे में मुझसे 2000 साल आगे हैं। वह मेरे आदर्श हैं और तब से हैं जब मैंने उनका काम पहली देखा। “शक्ति” फिल्म में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन जैसे दो महान अभिनेता आमने-सामने थे। अमिताभ को केवल दिलीप कुमार की आँखों में देखना था, लेकिन इस आसान से शॉट देने में उन्हें 22 रीटेक लगे। अमिताभ का कहना था कि दिलीप साहब की आँखों में झाँककर वे सब कुछ भूल जाते थे और बेहद नर्वस हो गए थे।
शाहरूख खान पर भी दिलीप कुमार का प्रभाव रहा है। दिलीप कुमार ने एक बार कहा भी है कि वे युवा अवस्था में शाहरूख जैसे दिखाई देते थे और ऎसा ही अभिनय करते थे। शाहरूख के बारे में सायरा बानो का कहना है कि यदि उनका बेटा होता तो वो शाहरूख जैसा ही होता। इस समय दिलीप कुमार की याददाश्त कमजोर हो गई है और पुरानी यादें धुँधली पड गई हैं। उनके निकटतम लोगों का कहना है कि वे किसी घटना के बारे में बताते-बताते दूसरी घटना के बारे में बात करने लगते हैं। लेकिन लोग उनसे बातें करना चाहते हैं। उन्हें सुनना चाहते हैं। लेकिन उनका स्वास्थ्य इस बात की इजाजत नहीं देता है और वे अपने बंगले में ही रहते हैं। धर्मेन्द्र अक्सर दिलीप साहब के बंगले पर जाते हैं और उनकी पसंद का खाना साथ ले जाते हैं। धर्मेन्द्र खुद एक बडे अभिनेता हैं, लेकिन अभी भी वे दिलीप साहब के पैरों में बैठकर उनसे बातें करते हैं। बॉलीवुड के कुछ पुराने कलाकार भी उनके हाल-चाल जानने के लिए उनके पास जाते हैं। इस अभिनय सम्राट की लंबी उम्र की कामना करते हुए हम उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हैं।

मेला, शहीद, अंदाज, आन, देवदास, नया दौर, मधुमती, यहूदी, पैगाम, मुगल-ए-आजम, गंगा-जमना, लीडर तथा राम और श्याम जैसी फिल्मों के सलोने नायक दिलीप कुमार स्वतंत्र भारत के पहले दो दशकों में लाखों युवा दर्शकों के दिलों की धडकन बन गए थे। अब तक भारतीय उपमहाद्वीप के करोडों लोग पर्दे पर उनकी चमत्कारी अभिनय कला का जायजा ले चुके हैं। सभ्य, सुसंस्कृत, कुलीन इस अभिनेता ने रंगीन और रंगहीन (श्वेत-श्याम) सिनेमा के पर्दे पर अपने आपको कई रूपों में प्रस्तुत किया। असफल प्रेमी के रूप में उन्होंने विशेष ख्याति पाई, लेकिन यह भी सिद्ध किया कि हास्य भूमिकाओं में वे किसी से कम नहीं हैं। वे ट्रेजेडी किंग भी कहलाए और ऑलराउंडर भी। उनकी गिनती अतिसंवेदनशील कलाकारों में की जाती है, लेकिन दिल और दिमाग के सामंजस्य के साथ उन्होंने अपने व्यक्तित्व और जीवन को ढाला। वे अपने आप में स्वनिर्मित मनुष्य की जीती-जागती मिसाल हैं। उनकी निजी जिन्दगी हमेशा कौतुहल का विषय रही, जिसमें रोजमर्रा के सुख-दु:ख, उतार-चढाव, मिलना-बिछुडना, इकरार-तकरार सभी शामिल थे। ईश्वर-भीरू दिलीप कुमार को साहित्य, संगीत और दर्शन की अभिरूचि ने गंभीर और प्रभावशाली हस्ती बना दिया। पच्चीस वर्ष की उम्र में दिलीप कुमार ने अपने को भारतीय फिल्म उद्योग का पहला सितारा बना लिया था।
वह आजादी का उदयकाल था। दिलीप कुमार की सितारा हैसियत अभी शैशवावस्था में ही थी कि फिल्म उद्योग में राजकपूर और देव आनंद का आगमन हुआ और थोडे ही अन्तराल में फिल्म उद्योग में दिलीप-राज-देव की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति का निर्माण हुआ। ये नए चेहरे आम सिने दर्शकों को मोहक लगे। इनसे पूर्व के अधिकांश हीरो प्रौढ नजर आते थे। दिलीप कुमार प्रतिष्ठित फिल्म निर्माण संस्था बॉम्बे टॉकिज की उपज हैं, जहाँ देविका रानी ने उन्हें काम और नाम दिया। यहीं वे यूसुफ सरवर खान से दिलीप कुमार बने और यहीं उन्होंने अभिनय का ककहरा सीखा। अशोक कुमार और शशधर मुखर्जी ने फिल्मिस्तान की फिल्मों में लेकर दिलीप कुमार के करियर को सही दिशा में आगे बढाया। फिर नौशाद, मेहबूब, बिमल राय, के. आसिफ तथा दक्षिण के एसएस वासन ने दिलीप की प्रतिभा का दोहन कर क्लासिक फिल्में देश को दीं। 44 साल की उम्र में अभिनेत्री सायरा बानो से विवाह करने तक दिलीप कुमार वे सब फिल्में कर चुके थे, जिनके लिए आज उन्हें याद किया जाता है।
बाद में दिलीप कुमार ने कभी काम और कभी विश्राम की कार्यशैली अपनाई। वैसे वे इत्मीनान से काम करने के पक्षधर शुरू से थे। अपनी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को दिलीप कुमार ने पैसा कमाने के लिए कभी नहीं भुनाया।
आज ज्यादातर लोगों को इस बात पर आpर्य होता है कि इस महानायक ने सिर्फ 54 फिल्में क्यों की। लेकिन इसका उत्तर है दिलीप कुमार ने अपनी इमेज का सदैव ध्यान रखा और अभिनय स्तर को कभी गिरने नहीं दिया। इसलिए आज तक वे अभिनय के पारसमणि बने हुए हैं जबकि धूम-धडाके के साथ कई सुपर स्टार, मेगा स्टार आए और आकर चले गए। दिलीप कुमार ने अभिनय के माध्यम से राष्ट्र की जो सेवा की, उसके लिए भारत सरकार ने उन्हें 1991 में पद्मभूषण की उपाधि से नवाजा था और 1995 में फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फालके अवॉर्ड भी प्रदान किया। पाकिस्तान सरकार ने भी उन्हें 1997 में निशान-ए-इम्तियाज से नवाजा था, जो पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। 1953 में फिल्म फेयर पुरस्कारों के श्रीगणेश के साथ दिलीप कुमार को फिल्म दाग के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था।
अपने जीवनकाल में दिलीप कुमार कुल आठ बार फिल्म फेयर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार पा चुके हैं और यह एक कीर्तिमान है जिसे अभी तक तोडा नहीं जा सका। अंतिम बार उन्हें सन् 1982 में फिल्म शक्ति के लिए यह इनाम दिया गया था, जबकि फिल्म फेयर ने ही उन्हें 1993 में राज कपूर की स्मृति में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया। फिल्म फेयर ने जिन छह अन्य फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया वे हैं आजाद (1955), देवदास (1956), नया दौर (1957), कोहिनूर (1960), लीडर (1964) तथा राम और श्याम (1967)। 1997 में उन्हें भारतीय सिनेमा के बहुमूल्य योगदान देने के लिए एनटी रामाराव अवॉर्ड दिया गया, जबकि 1998 में समाज कल्याण के क्षेत्र में योगदान के लिए रामनाथ गोयनका अवॉर्ड दिया गया।
दिलीप कुमार फिल्म जगत की अजीमुश्शान हस्ती हैं। उन्हें अभिनय का पर्यायवाची माना जाता है। अपनी समस्त फिल्मों में उन्होंने दिल लगाकर काम किया और अनेक किरदारों में जीवंत प्रस्तुति दी। आरंभिक अनेक फिल्मों में उन्होंने निराश प्रेमी की छवि को प्रस्तुत किया, इसलिए उन्हें ट्रेजेडी किंग कहा गया। दर्दभरी दास्तानों को दोहराते-दोहराते उनकी यह हालत हो गई थी कि दर्द उनके अंदर तक पहुँच गया था और वे संभ्रम की स्थिति में जाने लगे थे। निराशावादी मन:स्थिति से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने अपने करियर के आरंभिक वर्षो में ही लंदन के एक मनोचिकित्सक से संपर्क करके उपचार पूछा तो उन्हें सलाह दी गई कि ट्रेजेडी के साथ ही कॉमेडी फिल्में भी करते रहें। डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने आजाद, कोहिनूर, आन, नया दौर फिल्मों में खिलंदड प्रेमी की भूमिकाएँ निभाई। नया दौर फिल्म का गीत “उडे जब-जब जुल्फें तेरी” युवा दिलीप कुमार का सटीक चित्रण है। दर्शकों का उनके प्रति दीवानगी का यही आलम था। दाग और आन, देवदास और आजाद, मुगल-ए-आजम और कोहिनूर जैसी विपरीत स्वभाव वाली उनकी फिल्में आमने-सामने ही रिलीज हुई थीं। एक तरफ वे दर्शकों को पीडा की सुखानुभूति देते, तो दूसरी तरफ लोगों का मनोरंजन करते। किसी भी नट की यह विवशता ही होती है। अपने साथ वे नाटकीयता का एक तूफान लेकर आए थे। फिल्मों में उनके नए-नए रूप देखकर दर्शक दंग रह जाते थे। अभिनय के प्रति दिलीप कुमार का रवैया सदा पूर्णतावादी रहा। युवावस्था में वे फिल्मों के प्राणाधार होते थे तो अपने दूसरे दौर की प्रौढ भूमिकाओं में भी उन्होंने नवीनताएँ दीं। राम और श्याम में उन्होंने डबल रोल किया और बैराग में तीन भूमिकाएँ की। बैराग (1976) के बाद उन्होंने पाँच साल का अवकाश मनाया और मनोज कुमार की क्रांति (1981) से फिल्मों में उनकी वापसी हुई। दिलीप कुमार को अभिनय का मदरसा भी कहा गया। अपनी वापसी में उन्होंने क्रांति के बाद सर्वाधिक प्रसिद्धि स्वयंभू शो मैन कहलाने वाले निर्माता निर्देशक सुभाष घई की विधाता (1982) से पाई। इस फिल्म में उन्होंने माफिया डॉन शमशेर सिंह के किरदार को जिस अंदाज में परदे पर पेश किया वैसा तो शायद महानायक माने जाने वाले अमिताभ बच्चन भी न कर पाए हैं। सुभाष घई पहले ऎसे निर्देशक रहे जिन्होंने शोले के कथानक को एक रूप में लेकर “कर्मा” का निर्माण किया और इस फिल्म में जेलर की भूमिका दिलीप कुमार को निभाने के लिए दी। कर्मा (1986) की कहानी में आतंकवाद को शामिल किया गया, जो उस समय भारत में चरम पर था। इस फिल्म में दिलीप कुमार के सामने अनुपम खेर ने खलनायक डॉ. डेंग की भूमिका अभिनीत की थी। इन दोनों सितारों के आमने-सामने के दृश्य आज भी दर्शकों के जेहन में घूमते हैं। विशेषकर बिना किसी संवाद के दिलीप कुमार का अनुपर खेर को थप्पड मारने वाला दृश्य अविस्मरणीय दृश्य है।
दिलीप कुमार : जन्म दिन पर विशेष अभिनय का वास्तविक महानायक
दिसम्बर 22, 2011 khaskhabar द्वारा